Thursday, October 17, 2024

ओ बुत उछालने वाले सुन

ओ बुत उछालने वाले सुन !आंखे निकालने वाले सुन !

तकरीर में ज़हर खुरानी की
तस्वीर में गलत बयानी की
शर्म हया सब पानी की
हर जगह बहुत बेमानी की
अब ईमान जगाए जाएंगें सब झूठ गिराए जाएंगे
खुशियां नाचेंगी हुए शगुन ! ओ बुत उछालने वाले सुन!

माना जलवा है पुर शोहरत
पर तीर बुझा तू पुर नफ्रत
ऐ लूट लुटेरों के गायक
गीत गज़ल तेरे पुर हरकत
अब जहर उतारे जाएंगे अमृत चखवाए जाएँगें
बजेगी चैनोअम्‌न की धुन ! ओ बुत उछालने वाले सुन !

अब अंधेरों की शामत है
झूठो के लिए कयामत है 
शौकत है वतन परस्तों का
बस गद्‌दारो को आफत है
जो माटी को ठुकराऐंगें वे तड़ीपार ही जाएंगे
सुन सकता है तो आहट सुन ! ओ बुत उछालने वाले सुन!

तुम कितने हमले कर लोगे
तुम कितने हल्ले बोलोगे
दिन हवा हुए गुंडो के अब
जल्दी ही खुद पर रो लोगे
कातिल जितने भी आएंगे  दोजख के रस्ते जाऐगे
बेशक तू अपने सर को धुन ! ओ बुत उछालने वाले सुन!

5Jan 2020

विमर्श

एक विमर्श का भाग 

ब्राह्मण का अर्थ होता है
निरंतर विस्तारित
व्यवहार में ब्राह्मण का अर्थ है
जो सबका भला चाहता है
किंतु जो सबका भला नहीं चाहता उसे आप कैसे ब्राह्मण कह सकते हैं ? जो समाज का स्वप्रेरित रक्षण नहीं करता वह कैसे क्षत्रिय है । जो लोक संग्राहक और लोक नियामक नहीं है वह वैश्य कैसे है ? जो श्रद्धापूर्वक निष्ठापूर्वक सेवा नहीं देता वह शूद्र भी नहीं है ।
आप उसे ठग कह सकते हैं 
हमारीवर्ण व्यवस्था में उसके लिए चांडाल शब्द है 
उदाहरण देखें
आज कोई अपने आप को अराजकतावादी कहता है तथा अपना सरनेम कोई ब्राह्मण वाला रखता है और उसके आधार पर सम्मान पाना चाहता है । सनातन के प्रति दुर्विचार रखता है ।उससे धिक्कार रखता है । 
यदि उसका उदाहरण देकर 
कोई कहे कि देखो यह ब्राह्मण तो ऐसा काम गर्हित कार्य करता है । और सभी ब्राह्मणों के लिए उसको आरोपित कर दें - तो क्या यह उचित होगा ?
यहां हमें कहना चाहिए कि समय-समय पर ब्राह्मणों के घर में ऐसे चांडाल पैदा हुए हैं ।
 जिन्होने कर्म कांड को अपने स्वार्थ के लिए प्रयुक्त करने के लिएअनेक स्थानों पर कथाओं कथानको और चरित्रों को विकृत किया है
वे स्वार्थी होते हुए भी स्वयं को ब्राह्मण कहते हैं 
यही सबसे बड़ी ठगी है ।
क्योंकि ब्राह्मण है तो स्वार्थी हो ही नहीं सकता
सनातन व्यवस्था है कि ब्राह्मण होने के लिए उस का अपरिग्रही होना पहली कसौटी है
क्योंकि संपत्ति सामान्य रूप से सब भ्रष्टाचरण की जड़ है सब दोषो की जड़ है
जब कोई संपत्तिसंग्रह अपने मन से त्याग देता है
तो फिर उससे कोई अपराध होने की संभावना ही कहां रह जाती है
किंतु आप क्या कह रहे हैं ?
आप ठग को ,चांडाल को ,ब्राह्मण कह रहे हैं
इन दोनों में अंतर करना पड़ेगा 
जन्मना जाएते शूद्रः संस्कारात द्विज उच्चयते
यह मनु का कथन है 
जन्म से सभी शूद्र 
वर्ण कर्मानुसार

वेद प्रकाश भाई आप निश्चय रूप से विद्वान हैं | आप की कोई त्रुटि नहीं बताई जा सकती
अपना मंतव्य अवश्य प्रकट किया जा सकता है

कहना चाहूंगा कि 
जब आप ब्राह्मण शब्द का प्रयोग करते हैं तो ब्राह्मण का जो वास्तविक अर्थ है उसमें प्रयुक्त नहीं कर रहे

वेद प्रकाश भाई
 ठगो को आदर्श रूप प्रस्तुत करने वाले या मंदबुद्धि होते हैं या ठग ही होते है | 
हमारे यहा लगभग प्रत्येक पद के लिए अहर्ता निश्चित है । 
वही विशिष्ट वैशेषिकी का बोध कराता है । कुछ लोग यह चिन्हित कर पाते हैं अन्य उनका अनुसरण करते है । 
यही वैशेषिकी के कारण जो लाभ होता है धन मान यश का । कुछ लोभी बिना गुणों ( धर्म ) को धारण किए नील श्रृगाल की तरह स्वांग भरते हैं |
 पर हम (समाज )उनकी चिन्हार( जाति )बदल नहीं पाते |

 समाज के इस प्रमाद से वे बिना अहर्ता के भी वही कहलाते रहते है जो वस्तुतः वे नहीं हैं । 
इससे उन्हे ठगी करने में सहजता रहती है | 
वे गोदान के भोला की तरह होरी के बैल खोल लेते हैं । और होरी की असजगता या सरलता के कारण अपनी आत्मा को भी अपराध मुक्त अनुभव कराते हैं |
 जब कि सरलता का लाभ उठाना भी अपराध है । 

किंतु अब न मर्मज्ञ रहे न तज्ञ रहे ।
 वह होना होगा । 
शब्द प्रयोग के साथ सजग रहना होगा । अन्यथा ठगी होती रहेगी ।

दूसरी बात अहर्ता केवल ब्राह्मणों के लिए ही नहीं है । यह क्षत्रिय वैश्य और शूद्र पर भी लागू है । 
यदि मस्तिष्क पांव में स्थिर होगा फिर आप को ब्राह्मण के लिए पांव की ही उपमा देनी होगी ।
वर्ण का गौरव करके वह कार्य न करने वाला हमारे यहां चान्डाल कहा जाता है । 
आज संसार में दो ही वर्ण सबसे बडी संख्या में हैं । एक वर्णशंकर और दूसरे चाण्डाल । ये अपनी विचार शुद्धि के साथ अपने वर्ण का मान गौरव प्राप्त कर सकते हैं ।
14 Dec 2023

प्रधान मंत्री मोदी जी को नए मुख्यमंत्रियों से अच्छा स्वच्छ प्रशासन तो चाहिए ही 
वे ऐसी शैली का प्रशासन चाहते हैं 
जिसमें भ्रष्टाचार करने की इच्छा ही समाप्त हो जाए । 
और जिन्हें भ्रष्टाचार की लालसा है वे तकनीक के सामने लाचार हो जाएं ।
जिसमें न्याय व करुणा का उच्चतम समन्वय हो । 

मोदी जी को ऐसे मंत्री चाहिए जो . 
- कर्तव्यनिष्ठ और नवाचार करने वाले अधिकारियों कर्मचारियों को पहचानने की योग्यता वाले हो . 
,जो प्रशासन को श्रेष्ठ कार्य करने वालों को उत्साह साहस व संरक्षण दे सके । 
तथा परियोजनाओ में व्यक्तिगत लाभ के लिए किए गए प्रावधानों को मर्यादित कर सकें । 
-जो अंतिम पक्ति के व्यक्ति के जीवन स्तर को सुधारने के लिए चिंतित व संकल्पित हों । 

अधिकारियों से वे अपेक्षा करते हैं कि समस्याएं गिनाने वाले नहीं । समाधान के लिए नेतृत्व करने वाले हों । समाधान के लिए पीछे पड़ने वाले हों ।
समन्वय व परिकल्पना के मॉडल आदर्श प्रस्तुत करने वाले हों । 

प्रधान मंत्री मोदी जी अपने प्रशासकों से ऐसा व्यवहार चाहते हैं जिसमें
सबका साथ सबका विकास व सबका विश्वास कदम कदम पर दिखे । पारदर्शिता हो , गति दिखे , जनता को लाभ दिखे ।
 साथ ही उन्हें अपव्यय मुक्त , नवीन तकनीकों से युक्त अनूठी परियोजनाएं भी चाहिए । जो रिकार्ड समय पर धरातल पर आ जाएं और जनता को उनकी सुविधा का सुख मिलने लगे ?

प्रधानमंत्री जी कर्मचारियो को पर्याप्त सुविधाएं , वेतन व पेंशन भी देना चाहते हैं ।  
लेकिन यह भी चाहते है कि कर्मचारी मन से अपने कार्य को जन हितकारी दिशा देते रहें ।
मम 12 Dec 2023

अंत्योदय आरक्षण

समय आ गया है कि अनुसूचित जातियों जनजातियों में अंत्योदय आरक्षण का अभियान चले 
३न जातियो में कुछ परिवार ऐसे है जिनमेँ पांच दस बीस आथिकारी हैं उन्हीं के दूसरे blood relative परिवार में भुखमरी की सिथाति है 
आरक्षण का लाभु किसी जाति विशेष को ३तना निल चुका है कि व उन्मत्त और आक्रामक हो रहे हैं 
वहीं मुसहर जैसी अनेक जातियों व परिवारो को यह भी नहीं पता कि योजनाओं का लाभ वे कैसे लें 
अतः जिन परिवारों को आज तक आरक्षण से सरकारी नौकरी नहीं मिली । उन्हीं परिवारों के सदस्य को आरक्षण में प्राथमिकता दी जाए 
आप ३से आरक्षण में आरक्षण कह सकते हैं मैं इसे अंत्योदय आरक्षण कहता हूं
12 APR 2018
जाति व वर्ण का अंतर समझिए 

जाति का अर्थ होता है समान पहचान 
यह अलग संदर्भों के साथ अर्थ भी बदल जाता है 
वर्ण का अर्थ है व्यक्तित्व का अथवा स्वभाव की प्रभा 
भौतिक रूप में कहेगें 
अमुक व्यक्ति गौर अथवा कृष्ण वर्ण का है 
व्यक्ति का स्वभाव किस कर्म में सहज है सरल शब्दों में कहें तो मन जहां लगता है वही उसका वर्ण है 
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र मूलतः वर्ण भेद हैं 
संताति मोह व व्यवसाय की आश्वस्ति के लिए जन्मतः जाति का प्रचलन आरंभ हुआ 
यह एक प्रकार का आरक्षण ही है 
३ससे परिवार में पैदा होने वाले भिन्न स्वभाव के सदस्य कुंठित और आक्रामक हुए 
धीरे धीरे यह बैर गहरे पैठता गया 
किंतु समाज का बौद्धिक स्तर ऊंचा रहते तक व्यक्तित्व स्वातंत्र्य का यह आदर बना रहा । चुनावी लोकतंत्र में यह समाप्त हुआ । 
आरक्षण आवश्यक था और रहेगा 
यह मनुष्यत्व की जीविता का आधार है । 
वर्तमान संघर्ष आरक्षण के संवैधानिक किंतु अनैतिक लाभ उठाने के कारण पैदा हुए नवधनबलियों के समूह के सत्ता व सुविधा के अमर्यादित लोभ का उत्पाद है 
आशा है मेरी बात आपके हृदय तक पंहुची होगी

12 APR 2018

राम जी का भावपूजन


यह भारत है । 
सदा ज्ञान में रत । 
हर बार नए सोपान बनाने 
और उन पर स्थापित होने को सन्नद्ध । 
यहाँ आदर्श लक्ष्य है । 
किंतु अधिकतम प्रयास के उपरांत 
प्राप्त सुफल पर 
आनंदित होने का उपदेश
 स्वयं योगीराज कृष्ण दे गए है ।
अतः राम जी की इच्छा पर 
राम राम कहिए ।
राम आ रहे है 
अपना घर जैसा भी है 
उनकी इच्छा से है
उसी में स्वागत कीजिए 
जो क्षमता में है 
उसी से स्वागत कीजिए ।
पूजा के समय पंडित जी कहते है 
अमुक अमुक विधि है
यह यह सामग्री चाहिए 
किंतु यदि वह नहीं है 
या अपूर्ण है तो कोई बात नहीं
जितना है जैसा है
राम जी की इच्छा से ही है
भावपूजा से सबसे ऊपर है ।
और अब तो
भारत भाव के शिखर पर स्थापित है 
और श्रेष्ठतम पूजा में 
यही सर्वश्रेष्ठ सामग्री है 
तो करे राम जी का भावपूजन 

जय राम जी की ।

होली हृदय पटल के पा पा पर सुधियों का मेला है

हृदय पटल के पग पग पर सुधियों का मेला है 
फिर से आ गई होली फिर से मन रंगीला है 

भंवरे तितली फूल और कलियां सब हैं मस्ती में 
गली गली मदमाया मौसम डोले बस्ती में
रंग अबीर घुला रग रग में  मन की मौजो में 
बूढ़ा बरगद बाबू सोना हुआ सजीला है

कीच बना श्रृंगार आज हुड़दंगी टोली का
गल गलौच है अलंकार इठलाती बोली का
होड़ ले रहा महलो से उल्लास भी खोली का
बाहर तन और अन्तर्मन सब गीला गीला है

पुलक रहा है अंग अंग  बिना पिए ही भंग
मन करता मनुहार करे कोई आज मुझे भी तंग
जीत वार दूं आ दुलार दूं करू न कोई जंग
चूक न जाना होली का त्यौहार नशीला है 

जय होली जय जय प्रहलाद जय रंगोत्सव जय आह्लाद
आज जोड़ लें टूटे पुल पार करें कर लें संवाद
राजनीति को हद बतला दें राग राग में करें निनाद
समरसता का उत्सव यह कान्हा की लीला है

मम

Sunday, October 13, 2024

किधर के है किसके पराए किसके सगे हैं "वे" कौन हैं क्यों अधूरे उत्तरों के पूरकों पर , रहते सदा ये मौन हैं

त्रिलोचन जी की कविता में "तुम" कौन है ? इसका उत्तर नहीं मिला । अब इस कविता में भी पूछ रहा हूं ?

किधर के है किसके पराए किसके सगे हैं "वे" कौन हैं
क्यों अधूरे उत्तरों के पूरकों पर , रहते सदा ये मौन हैं 

राम रावण युद्ध में वे ही जय जय कर रहें हैं 
पर न खोला राज किसकी जय कामना वे कर रहे हैं 
भयभीत हैं यह छुपाने ,निरपेक्षता का ले लबादा
नक्सली ये हैं नगर के या नागरिक कुछ सभ्य ज्यादा
खेलना क्या आ गया शब्दों से इनको
खिलवाड अब ये संस्कृति से कर रहे हैं 
जब कभी बहती है प्रश्नों की नदी 
उत्तरों के पूरकों पर रहते सदा ये मौन हैं

टांग कर मझंधार , सर के बल कराते शीर्षासन
झोंक कर आंखो में सपने , स्वयं पाते शीर्ष आसन
सूज कर कुप्पा प्रयोजित , प्रशस्ति कीर्तनों से
हार कर बैठी है जनता थक गई है व्यर्थ के इन नर्तनो से
फिर भी इन विज्ञापनों में छोटे छोटे मार्गो का लोभ है
हार कर टूटे हुए पांवों को ठगी का क्षोभ है
इन रंगीले इन्द्रजालों के फंदको को रच रहा है कौन 
उत्तरो के पूरको पर रहते सदा ये मौन

Wednesday, September 25, 2024

smart

कुछ लोग बड़े प्रसन्न हैं 
हमारा शहर स्मार्ट हो गया 
अपना शहर तो पहले से ही स्मार्ट है 
ये बात और है कि स्मार्ट का अर्थ हम नहीं जानते 
अच्छा बताओ जब अपना कोई मित्र हमसे चालाकी करता है तो हम उसे क्या कहते हैं 
यही कहते हैं कि बेटा बहुत स्मार्ट हो गए हो पर यह स्मार्टनेस यहां नहीं चलेगी 
अंग्रेजी में गाली देने में और सुनने में भी बुरी नहीं लगती | यही कारण है कि हमेंअंग्रेजी अच्छी लगती है | ये और बात है कि हमें सही अर्थ ही पता नहीं होता तो क्या बुरा मानें | अच्छा ही मान लेते हैं |
तो स्मार्ट का अर्थ हुआ चालू या चालाक 
तो वैंकय्या नायडू जी ने साफ साफ कहा कि शहर स्मार्ट अपने नागरिकों के कारण ही बनता है | 
अब बताओ बिना हेलमेट पहने ही हम दोपहिया व बिना सीट बेल्ट बांधें गाड़ी चलाते है | लालबत्ती तोड़ कर निकल जाते हैं | लाईन तोड़ना |झूठ बोलना |अपनी सीट से गायब रहना |
बैठना तो काम नहीं करना | काम करना तो पैसे चाहना | नहीं तो चक्कर लगवाना या गुमराह करना | यदि नियम तोड़ने पर जुर्माना लगे तो घूस देकर या रंगदारी दिखाकर बचना | उधर जुर्माना वसूलने वाले का जुर्माने की रकम में गोलमाल करना | अपराध होते हुए देखना | पैसे न मिलने पर गरीब को अमीर बता दैना और पैसे मिलने पर अमीरों के बीपीएल कार्ड बनवा देना | बिजली चोरी के काकस मे शामिल रह कर विभाग को चूना लगाना | जो पैसे न दें उनके यहां अनापशनाप बिल भेजना | अतिक्रमण करवाने के पैसे लेना | बाद में अतिक्रमण तोड़ने का डर बता कर पैसे लेना | नकली खाद्य पदार्थो के चलन के पैसे लेना नहीं तो असली माल में भी कमीं निकाल देना | पेट्रोल डीजल कम देना | कोई माप से लेना चाहे तो प्रशासन के नियम बता कर उसे उल्लू बना देना | राजनीति में आकर खनन माफिया बनना | बिना परमिट बसे चलाना | बिना लाइसेंस शराब बेचना | ऐसे कितने हजारों और काम हैं जिन में हम शहर वासी चालू ही नहीं महाचालू यानी ,big smart हैं 
तो अब हमारी स्मार्टनेस हमें कहां ले जाएगी यह देखने वाला मामला है 
बधाई हो 
अपना महाचालू लोगों का शहर अब smart कहलाएगा 
बधाई

उर्दू

8 years before 25/09 / 87
एक तथ्य बताना चाहता हूं अनुसंधान के उपरांत ही स्वीकार करें 
उर्दू कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है 
यह हमारे पूर्वजों पर आक्रमण कर उन्हें लूटने वाले आताताइयों की भाषा थी | करोड़ो भारतीयों को इस्लाम स्वीकार करने के लिए विवश कर देने वालों की भाषा थी | उनकी माताओं बहनों के साथ बलात्कार जैसे जघन्य कुकृत्य करने वाले आक्रांताओं की कोड भाषा थी |
 अपने राजनीतिक हित सुरक्षित करने के लिए , हमारे पूर्वजों की माताओं बहनों को अपृहत कर बलात उनसे बच्चे पैदा कर इस्लामी अनुयायियों की संख्या बढा कर आतंक के बल पर शासक रहे अरबी फारसी आक्रांताओं की भाषा थी | जिसे हमने उनके शासनकाल में विवशतापूर्वक स्वीकार किया था | 
आज भारतीय उपमहाद्वीप में जो मुसलमान है वे सब या तो उन कुकृत्यों से उपजी संतानों के वंशज हैं या फिर आतंक से धर्मांतरित परिवारों के वंशज हैं | दुर्भाग्य यह है कि इनमे से कुछ आज भी आतंक के संवाहक हैं | यह तथाकथित उर्दू तब इस्लाम में नव धर्मांतरित व्यक्तियों के सांस्कृतिक परिवेश को परिवर्तित कर उनकी भारतीयता को समाप्त कर देने का कुचक्र था | ताकि उन्हें दासता दासता न लगे | वे अपने नए परिवेश में ही ढल कर अपने ही भाइयों के विरुद्ध उन बर्बर आक्रांताओं के विजय अभियान में सम्मिलित हो जाएं | 
इस दासता से मुक्त होने के लिए हमारे पूर्वजों ने हजार वर्ष बलिदान दिए और हमें यह स्वतंत्र परिवेश सौंपा | और हम हैं कि उनके बलिदानों को व्यर्थ कर अपनी दासता की परम्परा को ही शक्तिशाली करने मे जुटे हैं | 
आज जब मुस्लिमों में अनेक अपने पूर्वजों को ढूढते हुए अपने भारतीय मूल को समझ कर इस्लाम त्याग कर अपनी मूल धारा में वापसी के लिए मार्ग निकालने को प्रयासरत हैं | अनेको ने तो अपने मूल उपनाम पता कर उनका प्रयोग भी आरंभ करने का साहस किया है | जब वे अपने विद्रूप अतीत से मुक्त होने को आतुर हैं | हमें क्यों उस भयावह अतीत के प्रतीकों को महिमामंडित करना चाहिए | 
उर्दू भी एक हमारी दासता के दयनीय दिनों का ऐसा ही प्रतीक है | 
उर्दू स्वयं तुर्की भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है छावनी , सेना का आवास | एक भ्रम पैदा किया गया कि उर्दू भारतीय भाषा है | हिंदी वाक्य संरचना व्याकरण में इन अरबी फारसी तुर्की शब्दों का घालमेल आक्रांताओं को राज्य करने में उसी प्रकार सहायक थी जैसे हिंग्लिश के माध्यम से भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपना व्यापारिक साम्राज्य बढाया है |
अरबी फारसी शब्द कुछ ऐसे ही हिंदी को प्रदूषित कर उर्दू कहलाए जैसे आज इंग्लिश से प्रदूषित होकर हिन्दी हिंग्लिश हो रही है | 
यह नहीं कह रहा कि भाषाओं से बैर रखें | भाषाएं तो संप्रेषण का माध्यम है| अधिक भाषाएं आना अच्छी बात है |किंतु सत्य को सत्य के रूप में ही स्वीकार करना ठीक है | डालडा को डालडा कह कर लेना अच्छा है पर देशी घी कह कर कोई थमाए तो दुःख होता है | अरबी को अरबी के रूप में सीखें | तुर्की को तुर्की के रूप में | विदेशी को विदेशी के रूप में जानेंगे तो उचित व्यवहार कर सकेंगें | पराए को अपना समझ कर व्यवहार किया तो हानि होना ही है | अतिथि कक्ष के स्थान पर शयन कक्ष व चौके तक जाने दिया तो घर की अस्मिता सुरक्षा व संपत्ति को चोट पंहुचेगी ही | अतिथि देवो भवः हमारा सांस्कृतिक गौरव तत्व है | किंतु हमने चोट खाई | कारण था अतिथि के अर्थ को समझने में भूल करना | अतिथि अपरिचित नहीं होता | वह मात्र बिना सूचना के उपस्थित होता है | हमने अपिरिचित को भी अतिथि का स्थान दे दिया | हमने अपरिचित देवो भवः कर दिया | अतः निवेदन करते है व्यक्ति से परिस्थिति से शब्द से कार्य से उपकरण से परिचित होकर ही उचित व्यवहार का निर्धारण संभव है |
आशा है विचार करेंगें 
कोई अन्य संदेह हो तो प्रकट करेंगें | समाधान का प्रयास करूंगा |

Sunday, September 22, 2024

धर्मनिष्ठ डिगते नहीं जाएं भले ही प्राणमिले स्वयं को बेचते दास पतित अपमान नेता धनधारी बने बेच राष्ट्र का मानकवियों ने गिरवी रखा भाषाई अभिमानदौ कौड़ी में ही बिकें झूठे छल सामानकर्तव्यों को बेच कर अधिकारी धनवानकर्म साधना छोड़ उपदेशक होना सरल शिव होने के लिए पीना पड़ता है गरल

साथ हृदय के मन सुमन तन भी रहे पवित्र
तब विचार की वीथिका सुरभित रखे चरित्र

शिवता जीवन लक्ष्य हो शुभता के अध्याय
सुखअमृत को बांटती    करे लेखनी न्याय

धर्मनिष्ठ डिगते नहीं जाएं भले ही प्राण
मिले स्वयं को बेचते दास पतित अपमान  

नेता धनधारी बने बेच राष्ट्र का मान
कवियों ने गिरवी रखा भाषाई अभिमान

दौ कौड़ी में ही बिकें झूठे छल सामान
कर्तव्यों को बेच कर अधिकारी धनवान

कर्म साधना छोड़ उपदेशक होना सरल 
शिव होने के लिए पीना पड़ता है गरल

सत्य हमारी संस्कृति क्या सिखलाते हैं आप 
साँच  बराबर तप नहीं और झूठ बराबर पाप

झूठ और झूठन दोऊ     विवश, दुष्ट के शाप
सत्य सदा व्यक्तित्व की  रही महत् एक माप 

व्यास हमारे कुलगुरु सत् साहित्य विवेक
संभाषण ऐसा करें     हो समाज यह नेक

सत्य हमारी संस्कृति,  झूठ सिखाते आप ?
साँच  बराबर तप नहीं    झूठ बराबर पाप

अग्नि नहीं रखती कभी जल के जैसा भाव
बार बार अभ्यास से      बनता झूठ स्वभाव

जब भी कोई जान ले यह बस बोले झूंठ
गिर जाता है दृष्टि से       जैसे कोई ठूंठ

गाँव बसे हैं झूठन के सच्चन को गैल नहीं
फिर भी सच के साधन सा दूजा मेल नहीं

जिद के आगे जीत है चिढ़ के आगे हार 
जीत एक संगीत है ...हार एक फटकार 

पानी सा निर्मल मिले संतों का व्यबहार
मिलते मिलते धुल जाते दाग बिना व्यापार

हार खेल की सम लगे रण में है धिक्कार
उत्सव में आनन्दमय प्रेमी को स्वीकार

Friday, September 20, 2024

सत्य की खोज के लिए शब्दो के जंगल में भटकना , तर्को के तीखे कांटो से गुजरना , असहमति के खारे पानी से प्यास बुझाना , अनुभव होने तक आस्था के पथरीले रास्तों पर नंगे सिर सिर के बल चलना सब के बूते की बात नहीं है ।7oct 2019

सत्य की खोज के लिए 
शब्दो के जंगल में भटकना 
, तर्को के तीखे कांटो से गुजरना , 
असहमति के खारे पानी से प्यास बुझाना ,
 अनुभव होने तक 
आस्था के पथरीले रास्तों पर 
नंगे सिर  
सिर के बल चलना 
सब के बूते की बात नहीं है ।

7oct 2019

एक विमर्श का भाग ब्राह्मण का अर्थ होता हैनिरंतर विस्तारितव्यवहार में ब्राह्मण का अर्थ हैजो सबका भला चाहता हैकिंतु जो सबका भला नहीं चाहता उसे आप कैसे ब्राह्मण कह सकते हैं ? जो समाज का स्वप्रेरित रक्षण नहीं करता वह कैसे क्षत्रिय है । जो लोक संग्राहक और लोक नियामक नहीं है वह वैश्य कैसे है ? जो श्रद्धापूर्वक निष्ठापूर्वक सेवा नहीं देता वह शूद्र भी नहीं है ।आप उसे ठग कह सकते हैं हमारीवर्ण व्यवस्था में उसके लिए चांडाल शब्द है उदाहरण देखेंआज कोई अपने आप को अराजकतावादी कहता है तथा अपना सरनेम कोई ब्राह्मण वाला रखता है और उसके आधार पर सम्मान पाना चाहता है । सनातन के प्रति दुर्विचार रखता है ।उससे धिक्कार रखता है । यदि उसका उदाहरण देकर कोई कहे कि देखो यह ब्राह्मण तो ऐसा काम गर्हित कार्य करता है । और सभी ब्राह्मणों के लिए उसको आरोपित कर दें - तो क्या यह उचित होगा ?यहां हमें कहना चाहिए कि समय-समय पर ब्राह्मणों के घर में ऐसे चांडाल पैदा हुए हैं । जिन्होने कर्म कांड को अपने स्वार्थ के लिए प्रयुक्त करने के लिएअनेक स्थानों पर कथाओं कथानको और चरित्रों को विकृत किया हैवे स्वार्थी होते हुए भी स्वयं को ब्राह्मण कहते हैं यही सबसे बड़ी ठगी है ।क्योंकि ब्राह्मण है तो स्वार्थी हो ही नहीं सकतासनातन व्यवस्था है कि ब्राह्मण होने के लिए उस का अपरिग्रही होना पहली कसौटी हैक्योंकि संपत्ति सामान्य रूप से सब भ्रष्टाचरण की जड़ है सब दोषो की जड़ हैजब कोई संपत्तिसंग्रह अपने मन से त्याग देता हैतो फिर उससे कोई अपराध होने की संभावना ही कहां रह जाती हैकिंतु आप क्या कह रहे हैं ?आप ठग को ,चांडाल को ,ब्राह्मण कह रहे हैंइन दोनों में अंतर करना पड़ेगा जन्मना जाएते शूद्रः संस्कारात द्विज उच्चयतेयह मनु का कथन है जन्म से सभी शूद्र वर्ण कर्मानुसारवेद प्रकाश भाई आप निश्चय रूप से विद्वान हैं | आप की कोई त्रुटि नहीं बताई जा सकतीअपना मंतव्य अवश्य प्रकट किया जा सकता हैकहना चाहूंगा कि जब आप ब्राह्मण शब्द का प्रयोग करते हैं तो ब्राह्मण का जो वास्तविक अर्थ है उसमें प्रयुक्त नहीं कर रहेवेद प्रकाश भाई ठगो को आदर्श रूप प्रस्तुत करने वाले या मंदबुद्धि होते हैं या ठग ही होते है | हमारे यहा लगभग प्रत्येक पद के लिए अहर्ता निश्चित है । वही विशिष्ट वैशेषिकी का बोध कराता है । कुछ लोग यह चिन्हित कर पाते हैं अन्य उनका अनुसरण करते है । यही वैशेषिकी के कारण जो लाभ होता है धन मान यश का । कुछ लोभी बिना गुणों ( धर्म ) को धारण किए नील श्रृगाल की तरह स्वांग भरते हैं | पर हम (समाज )उनकी चिन्हार( जाति )बदल नहीं पाते | समाज के इस प्रमाद से वे बिना अहर्ता के भी वही कहलाते रहते है जो वस्तुतः वे नहीं हैं । इससे उन्हे ठगी करने में सहजता रहती है | वे गोदान के भोला की तरह होरी के बैल खोल लेते हैं । और होरी की असजगता या सरलता के कारण अपनी आत्मा को भी अपराध मुक्त अनुभव कराते हैं | जब कि सरलता का लाभ उठाना भी अपराध है । किंतु अब न मर्मज्ञ रहे न तज्ञ रहे । वह होना होगा । शब्द प्रयोग के साथ सजग रहना होगा । अन्यथा ठगी होती रहेगी ।दूसरी बात अहर्ता केवल ब्राह्मणों के लिए ही नहीं है । यह क्षत्रिय वैश्य और शूद्र पर भी लागू है । यदि मस्तिष्क पांव में स्थिर होगा फिर आप को ब्राह्मण के लिए पांव की ही उपमा देनी होगी ।वर्ण का गौरव करके वह कार्य न करने वाला हमारे यहां चान्डाल कहा जाता है । आज संसार में दो ही वर्ण सबसे बडी संख्या में हैं । एक वर्णशंकर और दूसरे चाण्डाल । ये अपनी विचार शुद्धि के साथ अपने वर्ण का मान गौरव प्राप्त कर सकते हैं ।

एक विमर्श का भाग 

ब्राह्मण का अर्थ होता है
निरंतर विस्तारित
व्यवहार में ब्राह्मण का अर्थ है
जो सबका भला चाहता है
किंतु जो सबका भला नहीं चाहता उसे आप कैसे ब्राह्मण कह सकते हैं ? जो समाज का स्वप्रेरित रक्षण नहीं करता वह कैसे क्षत्रिय है । जो लोक संग्राहक और लोक नियामक नहीं है वह वैश्य कैसे है ? जो श्रद्धापूर्वक निष्ठापूर्वक सेवा नहीं देता वह शूद्र भी नहीं है ।
आप उसे ठग कह सकते हैं 
हमारीवर्ण व्यवस्था में उसके लिए चांडाल शब्द है 
उदाहरण देखें
आज कोई अपने आप को अराजकतावादी कहता है तथा अपना सरनेम कोई ब्राह्मण वाला रखता है और उसके आधार पर सम्मान पाना चाहता है । सनातन के प्रति दुर्विचार रखता है ।उससे धिक्कार रखता है । 
यदि उसका उदाहरण देकर 
कोई कहे कि देखो यह ब्राह्मण तो ऐसा काम गर्हित कार्य करता है । और सभी ब्राह्मणों के लिए उसको आरोपित कर दें - तो क्या यह उचित होगा ?
यहां हमें कहना चाहिए कि समय-समय पर ब्राह्मणों के घर में ऐसे चांडाल पैदा हुए हैं ।
 जिन्होने कर्म कांड को अपने स्वार्थ के लिए प्रयुक्त करने के लिएअनेक स्थानों पर कथाओं कथानको और चरित्रों को विकृत किया है
वे स्वार्थी होते हुए भी स्वयं को ब्राह्मण कहते हैं 
यही सबसे बड़ी ठगी है ।
क्योंकि ब्राह्मण है तो स्वार्थी हो ही नहीं सकता
सनातन व्यवस्था है कि ब्राह्मण होने के लिए उस का अपरिग्रही होना पहली कसौटी है
क्योंकि संपत्ति सामान्य रूप से सब भ्रष्टाचरण की जड़ है सब दोषो की जड़ है
जब कोई संपत्तिसंग्रह अपने मन से त्याग देता है
तो फिर उससे कोई अपराध होने की संभावना ही कहां रह जाती है
किंतु आप क्या कह रहे हैं ?
आप ठग को ,चांडाल को ,ब्राह्मण कह रहे हैं
इन दोनों में अंतर करना पड़ेगा 
जन्मना जाएते शूद्रः संस्कारात द्विज उच्चयते
यह मनु का कथन है 
जन्म से सभी शूद्र 
वर्ण कर्मानुसार

वेद प्रकाश भाई आप निश्चय रूप से विद्वान हैं | आप की कोई त्रुटि नहीं बताई जा सकती
अपना मंतव्य अवश्य प्रकट किया जा सकता है

कहना चाहूंगा कि 
जब आप ब्राह्मण शब्द का प्रयोग करते हैं तो ब्राह्मण का जो वास्तविक अर्थ है उसमें प्रयुक्त नहीं कर रहे

वेद प्रकाश भाई
 ठगो को आदर्श रूप प्रस्तुत करने वाले या मंदबुद्धि होते हैं या ठग ही होते है | 
हमारे यहा लगभग प्रत्येक पद के लिए अहर्ता निश्चित है । 
वही विशिष्ट वैशेषिकी का बोध कराता है । कुछ लोग यह चिन्हित कर पाते हैं अन्य उनका अनुसरण करते है । 
यही वैशेषिकी के कारण जो लाभ होता है धन मान यश का । कुछ लोभी बिना गुणों ( धर्म ) को धारण किए नील श्रृगाल की तरह स्वांग भरते हैं |
 पर हम (समाज )उनकी चिन्हार( जाति )बदल नहीं पाते |

 समाज के इस प्रमाद से वे बिना अहर्ता के भी वही कहलाते रहते है जो वस्तुतः वे नहीं हैं । 
इससे उन्हे ठगी करने में सहजता रहती है | 
वे गोदान के भोला की तरह होरी के बैल खोल लेते हैं । और होरी की असजगता या सरलता के कारण अपनी आत्मा को भी अपराध मुक्त अनुभव कराते हैं |
 जब कि सरलता का लाभ उठाना भी अपराध है । 

किंतु अब न मर्मज्ञ रहे न तज्ञ रहे ।
 वह होना होगा । 
शब्द प्रयोग के साथ सजग रहना होगा । अन्यथा ठगी होती रहेगी ।

दूसरी बात अहर्ता केवल ब्राह्मणों के लिए ही नहीं है । यह क्षत्रिय वैश्य और शूद्र पर भी लागू है । 
यदि मस्तिष्क पांव में स्थिर होगा फिर आप को ब्राह्मण के लिए पांव की ही उपमा देनी होगी ।
वर्ण का गौरव करके वह कार्य न करने वाला हमारे यहां चान्डाल कहा जाता है । 
आज संसार में दो ही वर्ण सबसे बडी संख्या में हैं । एक वर्णशंकर और दूसरे चाण्डाल । ये अपनी विचार शुद्धि के साथ अपने वर्ण का मान गौरव प्राप्त कर सकते हैं ।

38 वीं वर्षगांठमुझे सहेजने संवारने गौरवपूर्ण रखने के लिए आभारसरस नदी सी बहती होमेरे मन में रहती होमैं पत्थऱ घाट किनारे कातुम छ्ल छ्ल छूती रहती होविहगों सी है ऊंची उड़ानकोकिल कंठी सुर मधुर तानविमल नवल तुम धवल कंवलमैं कंटक युति सांवल सेमलतुम शांत सरल मर्यादा मेंमुझे पल पल सहती रहती होहिरण्यमयी द्युतिं कांति किरणमोहक मृदुला मधुहास अरूणतुम हो प्रभात की शुभ बेलामें काम क्रोध मद मंद-पुंजमै हूं ज्वर का उत्ताप श्रृंगतुम दल -दल झरती रहती होरति-स्पर्शो की अनुभूतिअंतरतम शीतल करती हैतुम सुमन कली सी लज्जा मेंमैं बौराया सा भंवरा हूंसंकोच मोच न हो पायातुम कल कल करती रहती होललित ललक दृष्टित अपलकतुम कृष्णबिंदु दिक् दैव झलकतुम संदल वन की मलय पवनमें नगर सभ्यता का उपवनखोकर मुझमें अपना वैभवस्व, हल-हल .पीती २हती होमहामना जगुप्त

38 वीं वर्षगांठ
मुझे सहेजने संवारने गौरवपूर्ण रखने के लिए आभार

सरस नदी सी बहती हो
मेरे मन में रहती हो
मैं पत्थऱ घाट किनारे का
तुम छ्ल छ्ल छूती रहती हो

विहगों सी है ऊंची उड़ान
कोकिल कंठी सुर मधुर तान
विमल नवल तुम धवल कंवल
मैं कंटक युति सांवल सेमल
तुम शांत सरल मर्यादा में
मुझे पल पल सहती रहती हो

हिरण्यमयी द्युतिं कांति किरण
मोहक मृदुला मधुहास अरूण
तुम हो प्रभात की शुभ बेला
में काम क्रोध मद मंद-पुंज
मै हूं ज्वर का उत्ताप श्रृंग
तुम दल -दल झरती रहती हो

रति-स्पर्शो की अनुभूति
अंतरतम शीतल करती है
तुम सुमन कली सी लज्जा में
मैं बौराया सा भंवरा हूं
संकोच मोच न हो पाया
तुम कल कल करती रहती हो

ललित ललक दृष्टित अपलक
तुम कृष्णबिंदु दिक् दैव झलक
तुम संदल वन की मलय पवन
में नगर सभ्यता का उपवन
खोकर मुझमें अपना वैभव
स्व, हल-हल .पीती २हती हो

महामना जगुप्त

न से नफरत लिखने वालोप से प्यार भी लिखना सीखोप से पुल बनाओ खाई परप से प्रेम के धागे जोड़ो ह हीन बोध को छोडोंह से अब हुंकारे सीखोब से बुरी बहुत बदमाशी यह समझो और लो शाबासीब से बांधो नेह के बंधनखोलो गांठे सभी अपावनहर घर में उजियार अंधेरा सांप पकड़ने बनो सपेराअ से अप्प दीप हो जाओउजियारे से प्रीत लगाओअंधियारों से रिश्ते तोड़ो सच समझो सच खुद से जोड़ोअपने लिए तो सब जीते हैऔरो को भी देना सीखोमरण मारना बहुत सरल हैजीवन देने के गुर सीखोसब को आता बड़ी बात क्या ?तलवारो से गले काटनासीखो ! सीख सको आ जाऐतलवारों से खेत जोतनागांव गली हर आंगन में तबखुशियों का मंगल छाएगाधरती पर्वत नदियां नाचेहर आंगन झूमे गाएगा घसिया तक ही नहीं उदासीपण्डिताईन ,भी बैठी भूखीभूख की जात कुजात न कोईभूख की चाहत केवल रोटी चैन प्रेम से मिल जाए बसमिले भले ही सूखी रूखीभूख भगाओ भय मिट्वाओकविता तब उपचार बनेगीमन महकाकर तन उमगाकरजीवन का उपहार बनेगीलिखने का श्रम सार्थक होगा सब की जैजै कार बनेगीसाम्यवाद हृदयों में होगा समाज की सरकार बनेगीपूंजी सबकी गांठ में होगीसमरसता सांसो में होगी कोई वाद विवाद न होगाउड़ान सभी पांखो में होगीहिले मिले और साथ चलेंएक यहीं संकल्प चाहिएसबका हित साधन साधक हो केवल वही विकल्प चाहिए मम

न से नफरत लिखने वालो
प से प्यार भी लिखना सीखो
प से पुल बनाओ खाई पर
प से प्रेम के धागे जोड़ो 
ह हीन बोध को छोडों
ह से अब हुंकारे सीखो
ब से बुरी बहुत बदमाशी 
यह समझो और लो शाबासी
ब से बांधो नेह के बंधन
खोलो गांठे सभी अपावन
हर घर में उजियार अंधेरा 
सांप पकड़ने बनो सपेरा
अ से अप्प दीप हो जाओ
उजियारे से प्रीत लगाओ
अंधियारों से रिश्ते तोड़ो 
सच समझो सच खुद से जोड़ो
अपने लिए तो सब जीते है
औरो को भी देना सीखो
मरण मारना बहुत सरल है
जीवन देने के गुर सीखो
सब को आता बड़ी बात क्या ?
तलवारो से गले काटना
सीखो ! सीख सको आ जाऐ
तलवारों से खेत जोतना
गांव गली हर आंगन में तब
खुशियों का मंगल छाएगा
धरती पर्वत नदियां नाचे
हर आंगन झूमे गाएगा 
घसिया तक ही नहीं उदासी
पण्डिताईन ,भी बैठी भूखी
भूख की जात कुजात न कोई
भूख की चाहत केवल रोटी 
चैन प्रेम से मिल जाए बस
मिले भले ही सूखी रूखी
भूख भगाओ भय मिट्वाओ
कविता तब उपचार बनेगी
मन महकाकर तन उमगाकर
जीवन का उपहार बनेगी
लिखने का श्रम सार्थक होगा 
सब की जैजै कार बनेगी
साम्यवाद हृदयों में होगा 
समाज की सरकार बनेगी
पूंजी सबकी गांठ में होगी
समरसता सांसो में होगी  
कोई वाद विवाद न होगा
उड़ान सभी पांखो में होगी
हिले मिले और साथ चलें
एक यहीं संकल्प चाहिए
सबका हित साधन साधक हो 
केवल वही विकल्प चाहिए 

मम29nov 23

उनके आगे बौने है पूरी तरह से छौने है हाँ उनसे भी दुबले है लेकिन वे तो पुतले हैंमम

 उनके आगे बौने है पूरी तरह से छौने है हाँ उनसे भी दुबले है लेकिन वे तो पुतले हैंमम


करो प्रकाशित दुखिया के सुख
सुखिया के उजियारे कर दो 
दीप कहे जय मेरी होगी
जितने चाहों अंधियारे भर दो

13nov 23 fb

छोटे छोटे लोभ गिराते बड़े बड़ो को
चढ़ बैठी है दीमक लग गई सभी जड़ो को 
 खेल भावना भूल-गए,ऐसी स्पर्धा
काट रहे हैं गले छोड़ कर गले-सड़ों को

18nov 23

तिलक लगा चोरी करी चोटी रख व्यभिचार
उसे न हिंदू जानिए वह धर्म विघातक स्यार

मम24nov 23 
संवाद पर होने लगे जब जब वाद विवाद
मौन सहेजो कृष्ण की गीता कर लो याद

-मम5nov 23

पत्थर पर खिला फूल हूँ 
हर अनय के लिए शूल हूँ
प्रतिभद्र हूँ अभद्र के लिए
धर्म के लिए ही अनुकूल हूँ

बॉह के नाग प्रकरण नहीं
अलंकर हैं शुभंकर हैं
हिंसक से भी हिंसा नहीं
यहां कंकर भी शंकर है
मेरा शौर्य है प्रतिरोधी
शूल के लिए मैं त्रिशूल हूँ
 
-मम
 
-मम

सिद्ध होए के पूर्व की दशा प्रसिद्ध कहाए
सिद्ध प्रसिद्ध का भेद जो जाने विद्य कहाए 
काग काग है काग से का तौले काकभुशुण्डि
जो जान गया है राम को तृप्ति सद्गति पाए

मम 19 Dec 2023
जहां न करना हो कुछ खर्चा
उस टॉपिक पर कर लो चर्चा

जहाँ पे होता हो जी खट्टा
जहाँ पे लगता हो कुछ बट्टा
जिस में होना हो कुछ रट्टा
वहां पे चुप्पी लुक्का छुप्पी
सुन कर सच खाजाते मिर्चा

राजनीति के घोर निदेशक
खेलो के महा-तज्ञ विशेषक
बढ़चढ कर करते संवाद
मुफ्त सलाह ढेरो बकवाद
बिना प्रार्थना पढ़ते पर्चा

मम 17 Dec 2023

दर्द बिना निर्माण न होता
पूछो अपनी माता से 
कितना दर्द सहा उसने
जन कर तुम्हें बढ़ाने में 
पी कर उसका खून ,आज 
शर्म नहीं गुर्राने में

कभी गिने क्या ?
कितने कत्ल हुए ,
लहराने अपने 
विश्वासों का परचम
विश्वासों की आड लूटा
कितनी श्रद्धाओं का आंगन
टूट गई जब जब तलवारें
 कितने छल छंदो को बोया
छलनी छलनी हुई मनुजता
जार जार आकाश भी रोया 
फिर भी बेशर्मी है लादी
खून को रंग बताने में

आक्रामक की और रक्षक की 
हिंसा में समता बतलाते
अब भी रंगे सियार बोटियां
लेकर आड मजहब की खाते
बडी बडी बातों में उलझा
सरल मनों को फांस रहे हैं
हूरों के सपने दिखला कर
टिकट मौत के बांट रहे है
 मजहब के धंधे में माहिर
सच को झूठ बनाने में

मम 16 Dec 2023

अपना अध्यवसाय जोड़नाउनका है व्यवसाय तोड़नातोड़फोड़ में मगन खूब वेहमको भी क्यों राह छोड़ना ?उनकी करनी भिन्न कथन सेबे-परवाह उत्थान पतन से वेदनाओं पर पाक बनातेछौंक घृणा का खूब लगातेवे विखेरते फूट के काँटेहमको तो है सब समेटनाउनका वातावरण कोड़नावे नित देते घाव जगत कोहम औषधि आलेपन तत्परदिखने में तो समान ही है हैं विलोम वृत्ति में परस्परवे विष का आरोपण करतेहमें हलाहल है निर्मूलनासारे ही विषदंत फोड़नाछ्ल छन्दों के उनके शोरअपनी प्रार्थनाओं से भोरउनकी अमा निशा से प्रीत दिनकर है अपना मनमीतउनको प्रिय है बैर बढ़ानाहम को भाता प्रेम सींचनाचाहें मन उनके भी मोड़नामम

अपना अध्यवसाय जोड़ना
उनका है व्यवसाय तोड़ना
तोड़फोड़ में मगन खूब वे
हमको भी क्यों राह छोड़ना ?

उनकी करनी भिन्न कथन से
बे-परवाह उत्थान पतन से 
वेदनाओं पर पाक बनाते
छौंक घृणा का खूब लगाते
वे विखेरते फूट के काँटे
हमको तो है सब समेटना
उनका वातावरण कोड़ना

वे नित देते  घाव जगत को
हम औषधि आलेपन तत्पर
दिखने में तो समान ही है 
हैं विलोम वृत्ति में परस्पर
वे विष का आरोपण करते
हमें हलाहल है निर्मूलना
सारे ही विषदंत फोड़ना

छ्ल छन्दों के उनके शोर
अपनी प्रार्थनाओं से भोर
उनकी अमा निशा से प्रीत 
दिनकर है अपना मनमीत
उनको प्रिय है बैर बढ़ाना
हम को भाता प्रेम सींचना
चाहें मन उनके भी मोड़ना

मम
12nov 2023 fb 

अपना अध्यवसाय जोड़ना
उनका है व्यवसाय तोड़ना
तोड़फोड़ में मगन खूब वे
हमको भी क्यों राह छोड़ना ?

उनकी करनी भिन्न कथन से
बे-परवाह उत्थान पतन से 
वेदनाओं पर पाक बनाते
छौंक घृणा का खूब लगाते
वे विखेरते फूट के काँटे
हमको तो है सब समेटना
उनका वातावरण कोड़ना

वे नित देते घाव जगत को
हम औषधि आलेपन तत्पर
दिखने में तो समान ही है 
हैं विलोम वृत्ति में परस्पर
वे विष का आरोपण करते
हमें हलाहल है निर्मूलना
सारे ही विषदंत फोड़ना

छ्ल छन्दों के उनके शोर
अपनी प्रार्थनाओं से भोर
उनकी अमा निशा से प्रीत 
दिनकर है अपना मनमीत
उनको प्रिय है बैर बढ़ाना
हम को भाता प्रेम सींचना
चाहें मन उनके भी मोड़ना

मम

छोटे छोटे लोभ गिराते बड़े बड़ो कोचढ़ बैठी है दीमक लग गई सभी जड़ो को खेल भावना भूल-गए,ऐसी स्पर्धाकाट रहे हैं गले छोड़ कर गले-सड़ों को

छोटे छोटे लोभ गिराते बड़े बड़ो को
चढ़ बैठी है दीमक लग गई सभी जड़ो को 
 खेल भावना भूल-गए,ऐसी स्पर्धा
काट रहे हैं गले छोड़ कर गले-सड़ों को

Tuesday, September 17, 2024

अभी तो ये अगड़ाई है बाकी बड़ी लड़ाई हैअवसर दिया है प्रभु ने कर लें चिंतन थोड़ा पहचान करो विश्वस्तों कीदौड़े तब अश्वमेघ का घोड़ाहार हार कर जीते है कई समन्दर चोटियांपांव जरा सा फिसल गया हैहिम्मत नहीं गंवाई हैवेष पहन केसरिया बानाशरण ले लिए कई खड़कइसीलिए शायद कुछ जनताक्रोधित हो कर गई भड़कफिर भी गारंटी पर कायमसंघर्षषित हैं सिंह अनवरतजानबूझ कर झेले छल पर मानवता नहीं भुलाई हैहतप्रभ अवतारी कहते हैंअमंगलो में बड़ा रोष है अहंकार कहते विराट कोबुद्धि विलासी दृष्टि दोष हैकलंक डालना महावीर परकौन जगत कल्याण हैचन्द्रगुप्त का शौर्य रुके नदुर्गम भले चढ़ाई है

अभी तो ये अगड़ाई है बाकी बड़ी  लड़ाई हैअवसर दिया है प्रभु ने कर लें चिंतन थोड़ा पहचान करो विश्वस्तों कीदौड़े तब अश्वमेघ का घोड़ाहार हार कर जीते है कई समन्दर चोटियांपांव जरा सा फिसल गया हैहिम्मत नहीं गंवाई हैवेष पहन केसरिया बानाशरण ले लिए कई खड़कइसीलिए शायद कुछ जनताक्रोधित हो कर गई भड़कफिर भी गारंटी पर कायमसंघर्षषित हैं सिंह अनवरतजानबूझ कर झेले छल पर मानवता नहीं भुलाई हैहतप्रभ अवतारी कहते हैंअमंगलो में बड़ा रोष है अहंकार कहते विराट कोबुद्धि विलासी दृष्टि दोष हैकलंक डालना महावीर परकौन जगत कल्याण हैचन्द्रगुप्त का शौर्य रुके नदुर्गम भले  चढ़ाई है

बाबस्ता बदगुमानी में उनके सहरोशाम तब भी थे अब भी हैंइनामेनिजामत के गुलाम कुछ हुक्काम तब भी थे अब भी हैंवक्त की करवट पे भी कई नींदे न खुली , खुल ही नहीं सकींख्वाब दर ख्वाब गुलफामों के इंतजाम तब भी थे अब भी हैंएक किताब से बंधना था बंधे हैं उसी किताब को छोड़ करअपनी ज़फा पे कायम जान के अंजाम तब भी थे अब भी हैंमम

बाबस्ता बदगुमानी में उनके सहरोशाम तब भी थे अब भी हैंइनामेनिजामत के गुलाम कुछ हुक्काम तब भी थे अब भी हैंवक्त की करवट पे भी कई नींदे न खुली , खुल ही नहीं सकींख्वाब दर ख्वाब गुलफामों के इंतजाम  तब भी थे अब भी हैंएक किताब से बंधना था बंधे हैं उसी किताब को छोड़ करअपनी ज़फा पे कायम जान के अंजाम तब भी थे अब भी हैंमम

जाति व वर्ण का अंतर समझिए जाति का अर्थ होता है समान पहचान यह अलग संदर्भों के साथ अर्थ भी बदल जाता है वर्ण का अर्थ है व्यक्तित्व का अथवा स्वभाव की प्रभा भौतिक रूप में कहेगें अमुक व्यक्ति गौर अथवा कृष्ण वर्ण का है व्यक्ति का स्वभाव किस कर्म में सहज है सरल शब्दों में कहें तो मन जहां लगता है वही उसका वर्ण है ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र मूलतः वर्ण भेद हैं संताति मोह व व्यवसाय की आश्वस्ति के लिए जन्मतः जाति का प्रचलन आरंभ हुआ यह एक प्रकार का आरक्षण ही है ३ससे परिवार में पैदा होने वाले भिन्न स्वभाव के सदस्य कुंठित और आक्रामक हुए धीरे धीरे यह बैर गहरे पैठता गया किंतु समाज का बौद्धिक स्तर ऊंचा रहते तक व्यक्तित्व स्वातंत्र्य का यह आदर बना रहा । चुनावी लोकतंत्र में यह समाप्त हुआ । आरक्षण आवश्यक था और रहेगा यह मनुष्यत्व की जीविता का आधार है । वर्तमान संघर्ष आरक्षण के संवैधानिक किंतु अनैतिक लाभ उठाने के कारण पैदा हुए नवधनबलियों के समूह के सत्ता व सुविधा के अमर्यादित लोभ का उत्पाद है आशा है मेरी बात आपके हृदय तक पंहुची होगी

जाति व वर्ण का अंतर समझिए 

जाति का अर्थ होता है समान पहचान 
यह अलग संदर्भों के  साथ अर्थ भी बदल जाता है 
वर्ण का अर्थ है व्यक्तित्व का अथवा स्वभाव की प्रभा 
भौतिक रूप में कहेगें 
अमुक व्यक्ति गौर अथवा कृष्ण वर्ण का है 
व्यक्ति का स्वभाव किस कर्म में सहज है सरल शब्दों में कहें तो मन जहां लगता है  वही उसका वर्ण है 
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र मूलतः वर्ण भेद हैं 
संताति मोह व व्यवसाय की आश्वस्ति के लिए जन्मतः जाति का प्रचलन आरंभ हुआ 
यह एक प्रकार का आरक्षण ही है 
३ससे परिवार में पैदा होने वाले भिन्न स्वभाव के सदस्य कुंठित और आक्रामक हुए 
धीरे धीरे यह बैर गहरे पैठता गया 
किंतु समाज का बौद्धिक स्तर ऊंचा रहते तक व्यक्तित्व स्वातंत्र्य का यह आदर बना रहा । चुनावी लोकतंत्र में यह समाप्त हुआ । 
आरक्षण आवश्यक था और रहेगा 
यह मनुष्यत्व की जीविता का आधार है । 
वर्तमान संघर्ष आरक्षण के संवैधानिक किंतु अनैतिक लाभ उठाने के कारण पैदा हुए नवधनबलियों के समूह के सत्ता व सुविधा के अमर्यादित लोभ का उत्पाद है 
आशा है मेरी बात आपके हृदय तक पंहुची होगी

कहन अच्छी है खयाल अच्छा है तो गज़ल भी अच्छी होती है कह गए शुकुल जी रामचंद्र भाषा संस्कृति की वाहक होती हैकबूतरो के फंसाने वाले शिकारी के कबूतर की कहानी सुनी हैउसे अंदाज ही नहीं उसी के कारण उसीकी कौम गुलाम होती हैकटते रहे हैं पेड़ कुल्हाड़ी में लगे अपने ही कुल के बेट के कारणउन पेड़ो मे फूल न खिलते जिनमे जिंदगी की आग नही होती है

 कहन अच्छी है खयाल अच्छा है तो गज़ल भी अच्छी होती है 
कह गए शुकुल जी रामचंद्र भाषा संस्कृति की वाहक होती है

कबूतरो के फंसाने वाले शिकारी के कबूतर की कहानी सुनी है
उसे अंदाज ही नहीं  उसी के कारण उसीकी कौम गुलाम होती है

कटते रहे हैं पेड़ कुल्हाड़ी में लगे अपने ही कुल के बेट के कारण
उन पेड़ो मे फूल न खिलते  जिनमे जिंदगी की आग नही होती है