Sunday, September 22, 2024

धर्मनिष्ठ डिगते नहीं जाएं भले ही प्राणमिले स्वयं को बेचते दास पतित अपमान नेता धनधारी बने बेच राष्ट्र का मानकवियों ने गिरवी रखा भाषाई अभिमानदौ कौड़ी में ही बिकें झूठे छल सामानकर्तव्यों को बेच कर अधिकारी धनवानकर्म साधना छोड़ उपदेशक होना सरल शिव होने के लिए पीना पड़ता है गरल

साथ हृदय के मन सुमन तन भी रहे पवित्र
तब विचार की वीथिका सुरभित रखे चरित्र

शिवता जीवन लक्ष्य हो शुभता के अध्याय
सुखअमृत को बांटती    करे लेखनी न्याय

धर्मनिष्ठ डिगते नहीं जाएं भले ही प्राण
मिले स्वयं को बेचते दास पतित अपमान  

नेता धनधारी बने बेच राष्ट्र का मान
कवियों ने गिरवी रखा भाषाई अभिमान

दौ कौड़ी में ही बिकें झूठे छल सामान
कर्तव्यों को बेच कर अधिकारी धनवान

कर्म साधना छोड़ उपदेशक होना सरल 
शिव होने के लिए पीना पड़ता है गरल

सत्य हमारी संस्कृति क्या सिखलाते हैं आप 
साँच  बराबर तप नहीं और झूठ बराबर पाप

झूठ और झूठन दोऊ     विवश, दुष्ट के शाप
सत्य सदा व्यक्तित्व की  रही महत् एक माप 

व्यास हमारे कुलगुरु सत् साहित्य विवेक
संभाषण ऐसा करें     हो समाज यह नेक

सत्य हमारी संस्कृति,  झूठ सिखाते आप ?
साँच  बराबर तप नहीं    झूठ बराबर पाप

अग्नि नहीं रखती कभी जल के जैसा भाव
बार बार अभ्यास से      बनता झूठ स्वभाव

जब भी कोई जान ले यह बस बोले झूंठ
गिर जाता है दृष्टि से       जैसे कोई ठूंठ

गाँव बसे हैं झूठन के सच्चन को गैल नहीं
फिर भी सच के साधन सा दूजा मेल नहीं

जिद के आगे जीत है चिढ़ के आगे हार 
जीत एक संगीत है ...हार एक फटकार 

पानी सा निर्मल मिले संतों का व्यबहार
मिलते मिलते धुल जाते दाग बिना व्यापार

हार खेल की सम लगे रण में है धिक्कार
उत्सव में आनन्दमय प्रेमी को स्वीकार

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