साथ हृदय के मन सुमन तन भी रहे पवित्र
तब विचार की वीथिका सुरभित रखे चरित्र
शिवता जीवन लक्ष्य हो शुभता के अध्याय
सुखअमृत को बांटती करे लेखनी न्याय
मिले स्वयं को बेचते दास पतित अपमान
नेता धनधारी बने बेच राष्ट्र का मान
कवियों ने गिरवी रखा भाषाई अभिमान
दौ कौड़ी में ही बिकें झूठे छल सामान
कर्तव्यों को बेच कर अधिकारी धनवान
कर्म साधना छोड़ उपदेशक होना सरल
शिव होने के लिए पीना पड़ता है गरल
सत्य हमारी संस्कृति क्या सिखलाते हैं आप
साँच बराबर तप नहीं और झूठ बराबर पाप
झूठ और झूठन दोऊ विवश, दुष्ट के शाप
सत्य सदा व्यक्तित्व की रही महत् एक माप
व्यास हमारे कुलगुरु सत् साहित्य विवेक
संभाषण ऐसा करें हो समाज यह नेक
सत्य हमारी संस्कृति, झूठ सिखाते आप ?
साँच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप
अग्नि नहीं रखती कभी जल के जैसा भाव
बार बार अभ्यास से बनता झूठ स्वभाव
जब भी कोई जान ले यह बस बोले झूंठ
गिर जाता है दृष्टि से जैसे कोई ठूंठ
गाँव बसे हैं झूठन के सच्चन को गैल नहीं
फिर भी सच के साधन सा दूजा मेल नहीं
जिद के आगे जीत है चिढ़ के आगे हार
जीत एक संगीत है ...हार एक फटकार
पानी सा निर्मल मिले संतों का व्यबहार
मिलते मिलते धुल जाते दाग बिना व्यापार
हार खेल की सम लगे रण में है धिक्कार
उत्सव में आनन्दमय प्रेमी को स्वीकार
No comments:
Post a Comment