छोटे छोटे लोभ गिराते बड़े बड़ो को
चढ़ बैठी है दीमक लग गई सभी जड़ो को
खेल भावना भूल-गए,ऐसी स्पर्धा
काट रहे हैं गले छोड़ कर गले-सड़ों को
वह कौन? जिसे निष्कंटक पथ की चाह नहीं वह कौन ?कि जिसका प्रीत, प्रियं पाथेय नहीं सबकी अन्तर अभिलाषा है अजातशत्रु होना किंतु धर्म-दुविधा-संकट के हल तो ज्ञात नहीं
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