Tuesday, September 17, 2024
बाबस्ता बदगुमानी में उनके सहरोशाम तब भी थे अब भी हैंइनामेनिजामत के गुलाम कुछ हुक्काम तब भी थे अब भी हैंवक्त की करवट पे भी कई नींदे न खुली , खुल ही नहीं सकींख्वाब दर ख्वाब गुलफामों के इंतजाम तब भी थे अब भी हैंएक किताब से बंधना था बंधे हैं उसी किताब को छोड़ करअपनी ज़फा पे कायम जान के अंजाम तब भी थे अब भी हैंमम
बाबस्ता बदगुमानी में उनके सहरोशाम तब भी थे अब भी हैंइनामेनिजामत के गुलाम कुछ हुक्काम तब भी थे अब भी हैंवक्त की करवट पे भी कई नींदे न खुली , खुल ही नहीं सकींख्वाब दर ख्वाब गुलफामों के इंतजाम तब भी थे अब भी हैंएक किताब से बंधना था बंधे हैं उसी किताब को छोड़ करअपनी ज़फा पे कायम जान के अंजाम तब भी थे अब भी हैंमम
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment