Friday, September 20, 2024

एक विमर्श का भाग ब्राह्मण का अर्थ होता हैनिरंतर विस्तारितव्यवहार में ब्राह्मण का अर्थ हैजो सबका भला चाहता हैकिंतु जो सबका भला नहीं चाहता उसे आप कैसे ब्राह्मण कह सकते हैं ? जो समाज का स्वप्रेरित रक्षण नहीं करता वह कैसे क्षत्रिय है । जो लोक संग्राहक और लोक नियामक नहीं है वह वैश्य कैसे है ? जो श्रद्धापूर्वक निष्ठापूर्वक सेवा नहीं देता वह शूद्र भी नहीं है ।आप उसे ठग कह सकते हैं हमारीवर्ण व्यवस्था में उसके लिए चांडाल शब्द है उदाहरण देखेंआज कोई अपने आप को अराजकतावादी कहता है तथा अपना सरनेम कोई ब्राह्मण वाला रखता है और उसके आधार पर सम्मान पाना चाहता है । सनातन के प्रति दुर्विचार रखता है ।उससे धिक्कार रखता है । यदि उसका उदाहरण देकर कोई कहे कि देखो यह ब्राह्मण तो ऐसा काम गर्हित कार्य करता है । और सभी ब्राह्मणों के लिए उसको आरोपित कर दें - तो क्या यह उचित होगा ?यहां हमें कहना चाहिए कि समय-समय पर ब्राह्मणों के घर में ऐसे चांडाल पैदा हुए हैं । जिन्होने कर्म कांड को अपने स्वार्थ के लिए प्रयुक्त करने के लिएअनेक स्थानों पर कथाओं कथानको और चरित्रों को विकृत किया हैवे स्वार्थी होते हुए भी स्वयं को ब्राह्मण कहते हैं यही सबसे बड़ी ठगी है ।क्योंकि ब्राह्मण है तो स्वार्थी हो ही नहीं सकतासनातन व्यवस्था है कि ब्राह्मण होने के लिए उस का अपरिग्रही होना पहली कसौटी हैक्योंकि संपत्ति सामान्य रूप से सब भ्रष्टाचरण की जड़ है सब दोषो की जड़ हैजब कोई संपत्तिसंग्रह अपने मन से त्याग देता हैतो फिर उससे कोई अपराध होने की संभावना ही कहां रह जाती हैकिंतु आप क्या कह रहे हैं ?आप ठग को ,चांडाल को ,ब्राह्मण कह रहे हैंइन दोनों में अंतर करना पड़ेगा जन्मना जाएते शूद्रः संस्कारात द्विज उच्चयतेयह मनु का कथन है जन्म से सभी शूद्र वर्ण कर्मानुसारवेद प्रकाश भाई आप निश्चय रूप से विद्वान हैं | आप की कोई त्रुटि नहीं बताई जा सकतीअपना मंतव्य अवश्य प्रकट किया जा सकता हैकहना चाहूंगा कि जब आप ब्राह्मण शब्द का प्रयोग करते हैं तो ब्राह्मण का जो वास्तविक अर्थ है उसमें प्रयुक्त नहीं कर रहेवेद प्रकाश भाई ठगो को आदर्श रूप प्रस्तुत करने वाले या मंदबुद्धि होते हैं या ठग ही होते है | हमारे यहा लगभग प्रत्येक पद के लिए अहर्ता निश्चित है । वही विशिष्ट वैशेषिकी का बोध कराता है । कुछ लोग यह चिन्हित कर पाते हैं अन्य उनका अनुसरण करते है । यही वैशेषिकी के कारण जो लाभ होता है धन मान यश का । कुछ लोभी बिना गुणों ( धर्म ) को धारण किए नील श्रृगाल की तरह स्वांग भरते हैं | पर हम (समाज )उनकी चिन्हार( जाति )बदल नहीं पाते | समाज के इस प्रमाद से वे बिना अहर्ता के भी वही कहलाते रहते है जो वस्तुतः वे नहीं हैं । इससे उन्हे ठगी करने में सहजता रहती है | वे गोदान के भोला की तरह होरी के बैल खोल लेते हैं । और होरी की असजगता या सरलता के कारण अपनी आत्मा को भी अपराध मुक्त अनुभव कराते हैं | जब कि सरलता का लाभ उठाना भी अपराध है । किंतु अब न मर्मज्ञ रहे न तज्ञ रहे । वह होना होगा । शब्द प्रयोग के साथ सजग रहना होगा । अन्यथा ठगी होती रहेगी ।दूसरी बात अहर्ता केवल ब्राह्मणों के लिए ही नहीं है । यह क्षत्रिय वैश्य और शूद्र पर भी लागू है । यदि मस्तिष्क पांव में स्थिर होगा फिर आप को ब्राह्मण के लिए पांव की ही उपमा देनी होगी ।वर्ण का गौरव करके वह कार्य न करने वाला हमारे यहां चान्डाल कहा जाता है । आज संसार में दो ही वर्ण सबसे बडी संख्या में हैं । एक वर्णशंकर और दूसरे चाण्डाल । ये अपनी विचार शुद्धि के साथ अपने वर्ण का मान गौरव प्राप्त कर सकते हैं ।

एक विमर्श का भाग 

ब्राह्मण का अर्थ होता है
निरंतर विस्तारित
व्यवहार में ब्राह्मण का अर्थ है
जो सबका भला चाहता है
किंतु जो सबका भला नहीं चाहता उसे आप कैसे ब्राह्मण कह सकते हैं ? जो समाज का स्वप्रेरित रक्षण नहीं करता वह कैसे क्षत्रिय है । जो लोक संग्राहक और लोक नियामक नहीं है वह वैश्य कैसे है ? जो श्रद्धापूर्वक निष्ठापूर्वक सेवा नहीं देता वह शूद्र भी नहीं है ।
आप उसे ठग कह सकते हैं 
हमारीवर्ण व्यवस्था में उसके लिए चांडाल शब्द है 
उदाहरण देखें
आज कोई अपने आप को अराजकतावादी कहता है तथा अपना सरनेम कोई ब्राह्मण वाला रखता है और उसके आधार पर सम्मान पाना चाहता है । सनातन के प्रति दुर्विचार रखता है ।उससे धिक्कार रखता है । 
यदि उसका उदाहरण देकर 
कोई कहे कि देखो यह ब्राह्मण तो ऐसा काम गर्हित कार्य करता है । और सभी ब्राह्मणों के लिए उसको आरोपित कर दें - तो क्या यह उचित होगा ?
यहां हमें कहना चाहिए कि समय-समय पर ब्राह्मणों के घर में ऐसे चांडाल पैदा हुए हैं ।
 जिन्होने कर्म कांड को अपने स्वार्थ के लिए प्रयुक्त करने के लिएअनेक स्थानों पर कथाओं कथानको और चरित्रों को विकृत किया है
वे स्वार्थी होते हुए भी स्वयं को ब्राह्मण कहते हैं 
यही सबसे बड़ी ठगी है ।
क्योंकि ब्राह्मण है तो स्वार्थी हो ही नहीं सकता
सनातन व्यवस्था है कि ब्राह्मण होने के लिए उस का अपरिग्रही होना पहली कसौटी है
क्योंकि संपत्ति सामान्य रूप से सब भ्रष्टाचरण की जड़ है सब दोषो की जड़ है
जब कोई संपत्तिसंग्रह अपने मन से त्याग देता है
तो फिर उससे कोई अपराध होने की संभावना ही कहां रह जाती है
किंतु आप क्या कह रहे हैं ?
आप ठग को ,चांडाल को ,ब्राह्मण कह रहे हैं
इन दोनों में अंतर करना पड़ेगा 
जन्मना जाएते शूद्रः संस्कारात द्विज उच्चयते
यह मनु का कथन है 
जन्म से सभी शूद्र 
वर्ण कर्मानुसार

वेद प्रकाश भाई आप निश्चय रूप से विद्वान हैं | आप की कोई त्रुटि नहीं बताई जा सकती
अपना मंतव्य अवश्य प्रकट किया जा सकता है

कहना चाहूंगा कि 
जब आप ब्राह्मण शब्द का प्रयोग करते हैं तो ब्राह्मण का जो वास्तविक अर्थ है उसमें प्रयुक्त नहीं कर रहे

वेद प्रकाश भाई
 ठगो को आदर्श रूप प्रस्तुत करने वाले या मंदबुद्धि होते हैं या ठग ही होते है | 
हमारे यहा लगभग प्रत्येक पद के लिए अहर्ता निश्चित है । 
वही विशिष्ट वैशेषिकी का बोध कराता है । कुछ लोग यह चिन्हित कर पाते हैं अन्य उनका अनुसरण करते है । 
यही वैशेषिकी के कारण जो लाभ होता है धन मान यश का । कुछ लोभी बिना गुणों ( धर्म ) को धारण किए नील श्रृगाल की तरह स्वांग भरते हैं |
 पर हम (समाज )उनकी चिन्हार( जाति )बदल नहीं पाते |

 समाज के इस प्रमाद से वे बिना अहर्ता के भी वही कहलाते रहते है जो वस्तुतः वे नहीं हैं । 
इससे उन्हे ठगी करने में सहजता रहती है | 
वे गोदान के भोला की तरह होरी के बैल खोल लेते हैं । और होरी की असजगता या सरलता के कारण अपनी आत्मा को भी अपराध मुक्त अनुभव कराते हैं |
 जब कि सरलता का लाभ उठाना भी अपराध है । 

किंतु अब न मर्मज्ञ रहे न तज्ञ रहे ।
 वह होना होगा । 
शब्द प्रयोग के साथ सजग रहना होगा । अन्यथा ठगी होती रहेगी ।

दूसरी बात अहर्ता केवल ब्राह्मणों के लिए ही नहीं है । यह क्षत्रिय वैश्य और शूद्र पर भी लागू है । 
यदि मस्तिष्क पांव में स्थिर होगा फिर आप को ब्राह्मण के लिए पांव की ही उपमा देनी होगी ।
वर्ण का गौरव करके वह कार्य न करने वाला हमारे यहां चान्डाल कहा जाता है । 
आज संसार में दो ही वर्ण सबसे बडी संख्या में हैं । एक वर्णशंकर और दूसरे चाण्डाल । ये अपनी विचार शुद्धि के साथ अपने वर्ण का मान गौरव प्राप्त कर सकते हैं ।

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