Friday, September 20, 2024

38 वीं वर्षगांठमुझे सहेजने संवारने गौरवपूर्ण रखने के लिए आभारसरस नदी सी बहती होमेरे मन में रहती होमैं पत्थऱ घाट किनारे कातुम छ्ल छ्ल छूती रहती होविहगों सी है ऊंची उड़ानकोकिल कंठी सुर मधुर तानविमल नवल तुम धवल कंवलमैं कंटक युति सांवल सेमलतुम शांत सरल मर्यादा मेंमुझे पल पल सहती रहती होहिरण्यमयी द्युतिं कांति किरणमोहक मृदुला मधुहास अरूणतुम हो प्रभात की शुभ बेलामें काम क्रोध मद मंद-पुंजमै हूं ज्वर का उत्ताप श्रृंगतुम दल -दल झरती रहती होरति-स्पर्शो की अनुभूतिअंतरतम शीतल करती हैतुम सुमन कली सी लज्जा मेंमैं बौराया सा भंवरा हूंसंकोच मोच न हो पायातुम कल कल करती रहती होललित ललक दृष्टित अपलकतुम कृष्णबिंदु दिक् दैव झलकतुम संदल वन की मलय पवनमें नगर सभ्यता का उपवनखोकर मुझमें अपना वैभवस्व, हल-हल .पीती २हती होमहामना जगुप्त

38 वीं वर्षगांठ
मुझे सहेजने संवारने गौरवपूर्ण रखने के लिए आभार

सरस नदी सी बहती हो
मेरे मन में रहती हो
मैं पत्थऱ घाट किनारे का
तुम छ्ल छ्ल छूती रहती हो

विहगों सी है ऊंची उड़ान
कोकिल कंठी सुर मधुर तान
विमल नवल तुम धवल कंवल
मैं कंटक युति सांवल सेमल
तुम शांत सरल मर्यादा में
मुझे पल पल सहती रहती हो

हिरण्यमयी द्युतिं कांति किरण
मोहक मृदुला मधुहास अरूण
तुम हो प्रभात की शुभ बेला
में काम क्रोध मद मंद-पुंज
मै हूं ज्वर का उत्ताप श्रृंग
तुम दल -दल झरती रहती हो

रति-स्पर्शो की अनुभूति
अंतरतम शीतल करती है
तुम सुमन कली सी लज्जा में
मैं बौराया सा भंवरा हूं
संकोच मोच न हो पाया
तुम कल कल करती रहती हो

ललित ललक दृष्टित अपलक
तुम कृष्णबिंदु दिक् दैव झलक
तुम संदल वन की मलय पवन
में नगर सभ्यता का उपवन
खोकर मुझमें अपना वैभव
स्व, हल-हल .पीती २हती हो

महामना जगुप्त

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