जाति व वर्ण का अंतर समझिए
जाति का अर्थ होता है समान पहचान
यह अलग संदर्भों के साथ अर्थ भी बदल जाता है
वर्ण का अर्थ है व्यक्तित्व का अथवा स्वभाव की प्रभा
भौतिक रूप में कहेगें
अमुक व्यक्ति गौर अथवा कृष्ण वर्ण का है
व्यक्ति का स्वभाव किस कर्म में सहज है सरल शब्दों में कहें तो मन जहां लगता है वही उसका वर्ण है
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र मूलतः वर्ण भेद हैं
संताति मोह व व्यवसाय की आश्वस्ति के लिए जन्मतः जाति का प्रचलन आरंभ हुआ
यह एक प्रकार का आरक्षण ही है
३ससे परिवार में पैदा होने वाले भिन्न स्वभाव के सदस्य कुंठित और आक्रामक हुए
धीरे धीरे यह बैर गहरे पैठता गया
किंतु समाज का बौद्धिक स्तर ऊंचा रहते तक व्यक्तित्व स्वातंत्र्य का यह आदर बना रहा । चुनावी लोकतंत्र में यह समाप्त हुआ ।
आरक्षण आवश्यक था और रहेगा
यह मनुष्यत्व की जीविता का आधार है ।
वर्तमान संघर्ष आरक्षण के संवैधानिक किंतु अनैतिक लाभ उठाने के कारण पैदा हुए नवधनबलियों के समूह के सत्ता व सुविधा के अमर्यादित लोभ का उत्पाद है
आशा है मेरी बात आपके हृदय तक पंहुची होगी
No comments:
Post a Comment