कह गए शुकुल जी रामचंद्र भाषा संस्कृति की वाहक होती है
कबूतरो के फंसाने वाले शिकारी के कबूतर की कहानी सुनी है
उसे अंदाज ही नहीं उसी के कारण उसीकी कौम गुलाम होती है
कटते रहे हैं पेड़ कुल्हाड़ी में लगे अपने ही कुल के बेट के कारण
उन पेड़ो मे फूल न खिलते जिनमे जिंदगी की आग नही होती है
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