किधर के है किसके पराए किसके सगे हैं "वे" कौन हैं
क्यों अधूरे उत्तरों के पूरकों पर , रहते सदा ये मौन हैं
राम रावण युद्ध में वे ही जय जय कर रहें हैं
पर न खोला राज किसकी जय कामना वे कर रहे हैं
भयभीत हैं यह छुपाने ,निरपेक्षता का ले लबादा
नक्सली ये हैं नगर के या नागरिक कुछ सभ्य ज्यादा
खेलना क्या आ गया शब्दों से इनको
खिलवाड अब ये संस्कृति से कर रहे हैं
जब कभी बहती है प्रश्नों की नदी
उत्तरों के पूरकों पर रहते सदा ये मौन हैं
टांग कर मझंधार , सर के बल कराते शीर्षासन
झोंक कर आंखो में सपने , स्वयं पाते शीर्ष आसन
सूज कर कुप्पा प्रयोजित , प्रशस्ति कीर्तनों से
हार कर बैठी है जनता थक गई है व्यर्थ के इन नर्तनो से
फिर भी इन विज्ञापनों में छोटे छोटे मार्गो का लोभ है
हार कर टूटे हुए पांवों को ठगी का क्षोभ है
इन रंगीले इन्द्रजालों के फंदको को रच रहा है कौन
उत्तरो के पूरको पर रहते सदा ये मौन
No comments:
Post a Comment