Sunday, September 22, 2024

धर्मनिष्ठ डिगते नहीं जाएं भले ही प्राणमिले स्वयं को बेचते दास पतित अपमान नेता धनधारी बने बेच राष्ट्र का मानकवियों ने गिरवी रखा भाषाई अभिमानदौ कौड़ी में ही बिकें झूठे छल सामानकर्तव्यों को बेच कर अधिकारी धनवानकर्म साधना छोड़ उपदेशक होना सरल शिव होने के लिए पीना पड़ता है गरल

साथ हृदय के मन सुमन तन भी रहे पवित्र
तब विचार की वीथिका सुरभित रखे चरित्र

शिवता जीवन लक्ष्य हो शुभता के अध्याय
सुखअमृत को बांटती    करे लेखनी न्याय

धर्मनिष्ठ डिगते नहीं जाएं भले ही प्राण
मिले स्वयं को बेचते दास पतित अपमान  

नेता धनधारी बने बेच राष्ट्र का मान
कवियों ने गिरवी रखा भाषाई अभिमान

दौ कौड़ी में ही बिकें झूठे छल सामान
कर्तव्यों को बेच कर अधिकारी धनवान

कर्म साधना छोड़ उपदेशक होना सरल 
शिव होने के लिए पीना पड़ता है गरल

सत्य हमारी संस्कृति क्या सिखलाते हैं आप 
साँच  बराबर तप नहीं और झूठ बराबर पाप

झूठ और झूठन दोऊ     विवश, दुष्ट के शाप
सत्य सदा व्यक्तित्व की  रही महत् एक माप 

व्यास हमारे कुलगुरु सत् साहित्य विवेक
संभाषण ऐसा करें     हो समाज यह नेक

सत्य हमारी संस्कृति,  झूठ सिखाते आप ?
साँच  बराबर तप नहीं    झूठ बराबर पाप

अग्नि नहीं रखती कभी जल के जैसा भाव
बार बार अभ्यास से      बनता झूठ स्वभाव

जब भी कोई जान ले यह बस बोले झूंठ
गिर जाता है दृष्टि से       जैसे कोई ठूंठ

गाँव बसे हैं झूठन के सच्चन को गैल नहीं
फिर भी सच के साधन सा दूजा मेल नहीं

जिद के आगे जीत है चिढ़ के आगे हार 
जीत एक संगीत है ...हार एक फटकार 

पानी सा निर्मल मिले संतों का व्यबहार
मिलते मिलते धुल जाते दाग बिना व्यापार

हार खेल की सम लगे रण में है धिक्कार
उत्सव में आनन्दमय प्रेमी को स्वीकार

Friday, September 20, 2024

सत्य की खोज के लिए शब्दो के जंगल में भटकना , तर्को के तीखे कांटो से गुजरना , असहमति के खारे पानी से प्यास बुझाना , अनुभव होने तक आस्था के पथरीले रास्तों पर नंगे सिर सिर के बल चलना सब के बूते की बात नहीं है ।7oct 2019

सत्य की खोज के लिए 
शब्दो के जंगल में भटकना 
, तर्को के तीखे कांटो से गुजरना , 
असहमति के खारे पानी से प्यास बुझाना ,
 अनुभव होने तक 
आस्था के पथरीले रास्तों पर 
नंगे सिर  
सिर के बल चलना 
सब के बूते की बात नहीं है ।

7oct 2019

एक विमर्श का भाग ब्राह्मण का अर्थ होता हैनिरंतर विस्तारितव्यवहार में ब्राह्मण का अर्थ हैजो सबका भला चाहता हैकिंतु जो सबका भला नहीं चाहता उसे आप कैसे ब्राह्मण कह सकते हैं ? जो समाज का स्वप्रेरित रक्षण नहीं करता वह कैसे क्षत्रिय है । जो लोक संग्राहक और लोक नियामक नहीं है वह वैश्य कैसे है ? जो श्रद्धापूर्वक निष्ठापूर्वक सेवा नहीं देता वह शूद्र भी नहीं है ।आप उसे ठग कह सकते हैं हमारीवर्ण व्यवस्था में उसके लिए चांडाल शब्द है उदाहरण देखेंआज कोई अपने आप को अराजकतावादी कहता है तथा अपना सरनेम कोई ब्राह्मण वाला रखता है और उसके आधार पर सम्मान पाना चाहता है । सनातन के प्रति दुर्विचार रखता है ।उससे धिक्कार रखता है । यदि उसका उदाहरण देकर कोई कहे कि देखो यह ब्राह्मण तो ऐसा काम गर्हित कार्य करता है । और सभी ब्राह्मणों के लिए उसको आरोपित कर दें - तो क्या यह उचित होगा ?यहां हमें कहना चाहिए कि समय-समय पर ब्राह्मणों के घर में ऐसे चांडाल पैदा हुए हैं । जिन्होने कर्म कांड को अपने स्वार्थ के लिए प्रयुक्त करने के लिएअनेक स्थानों पर कथाओं कथानको और चरित्रों को विकृत किया हैवे स्वार्थी होते हुए भी स्वयं को ब्राह्मण कहते हैं यही सबसे बड़ी ठगी है ।क्योंकि ब्राह्मण है तो स्वार्थी हो ही नहीं सकतासनातन व्यवस्था है कि ब्राह्मण होने के लिए उस का अपरिग्रही होना पहली कसौटी हैक्योंकि संपत्ति सामान्य रूप से सब भ्रष्टाचरण की जड़ है सब दोषो की जड़ हैजब कोई संपत्तिसंग्रह अपने मन से त्याग देता हैतो फिर उससे कोई अपराध होने की संभावना ही कहां रह जाती हैकिंतु आप क्या कह रहे हैं ?आप ठग को ,चांडाल को ,ब्राह्मण कह रहे हैंइन दोनों में अंतर करना पड़ेगा जन्मना जाएते शूद्रः संस्कारात द्विज उच्चयतेयह मनु का कथन है जन्म से सभी शूद्र वर्ण कर्मानुसारवेद प्रकाश भाई आप निश्चय रूप से विद्वान हैं | आप की कोई त्रुटि नहीं बताई जा सकतीअपना मंतव्य अवश्य प्रकट किया जा सकता हैकहना चाहूंगा कि जब आप ब्राह्मण शब्द का प्रयोग करते हैं तो ब्राह्मण का जो वास्तविक अर्थ है उसमें प्रयुक्त नहीं कर रहेवेद प्रकाश भाई ठगो को आदर्श रूप प्रस्तुत करने वाले या मंदबुद्धि होते हैं या ठग ही होते है | हमारे यहा लगभग प्रत्येक पद के लिए अहर्ता निश्चित है । वही विशिष्ट वैशेषिकी का बोध कराता है । कुछ लोग यह चिन्हित कर पाते हैं अन्य उनका अनुसरण करते है । यही वैशेषिकी के कारण जो लाभ होता है धन मान यश का । कुछ लोभी बिना गुणों ( धर्म ) को धारण किए नील श्रृगाल की तरह स्वांग भरते हैं | पर हम (समाज )उनकी चिन्हार( जाति )बदल नहीं पाते | समाज के इस प्रमाद से वे बिना अहर्ता के भी वही कहलाते रहते है जो वस्तुतः वे नहीं हैं । इससे उन्हे ठगी करने में सहजता रहती है | वे गोदान के भोला की तरह होरी के बैल खोल लेते हैं । और होरी की असजगता या सरलता के कारण अपनी आत्मा को भी अपराध मुक्त अनुभव कराते हैं | जब कि सरलता का लाभ उठाना भी अपराध है । किंतु अब न मर्मज्ञ रहे न तज्ञ रहे । वह होना होगा । शब्द प्रयोग के साथ सजग रहना होगा । अन्यथा ठगी होती रहेगी ।दूसरी बात अहर्ता केवल ब्राह्मणों के लिए ही नहीं है । यह क्षत्रिय वैश्य और शूद्र पर भी लागू है । यदि मस्तिष्क पांव में स्थिर होगा फिर आप को ब्राह्मण के लिए पांव की ही उपमा देनी होगी ।वर्ण का गौरव करके वह कार्य न करने वाला हमारे यहां चान्डाल कहा जाता है । आज संसार में दो ही वर्ण सबसे बडी संख्या में हैं । एक वर्णशंकर और दूसरे चाण्डाल । ये अपनी विचार शुद्धि के साथ अपने वर्ण का मान गौरव प्राप्त कर सकते हैं ।

एक विमर्श का भाग 

ब्राह्मण का अर्थ होता है
निरंतर विस्तारित
व्यवहार में ब्राह्मण का अर्थ है
जो सबका भला चाहता है
किंतु जो सबका भला नहीं चाहता उसे आप कैसे ब्राह्मण कह सकते हैं ? जो समाज का स्वप्रेरित रक्षण नहीं करता वह कैसे क्षत्रिय है । जो लोक संग्राहक और लोक नियामक नहीं है वह वैश्य कैसे है ? जो श्रद्धापूर्वक निष्ठापूर्वक सेवा नहीं देता वह शूद्र भी नहीं है ।
आप उसे ठग कह सकते हैं 
हमारीवर्ण व्यवस्था में उसके लिए चांडाल शब्द है 
उदाहरण देखें
आज कोई अपने आप को अराजकतावादी कहता है तथा अपना सरनेम कोई ब्राह्मण वाला रखता है और उसके आधार पर सम्मान पाना चाहता है । सनातन के प्रति दुर्विचार रखता है ।उससे धिक्कार रखता है । 
यदि उसका उदाहरण देकर 
कोई कहे कि देखो यह ब्राह्मण तो ऐसा काम गर्हित कार्य करता है । और सभी ब्राह्मणों के लिए उसको आरोपित कर दें - तो क्या यह उचित होगा ?
यहां हमें कहना चाहिए कि समय-समय पर ब्राह्मणों के घर में ऐसे चांडाल पैदा हुए हैं ।
 जिन्होने कर्म कांड को अपने स्वार्थ के लिए प्रयुक्त करने के लिएअनेक स्थानों पर कथाओं कथानको और चरित्रों को विकृत किया है
वे स्वार्थी होते हुए भी स्वयं को ब्राह्मण कहते हैं 
यही सबसे बड़ी ठगी है ।
क्योंकि ब्राह्मण है तो स्वार्थी हो ही नहीं सकता
सनातन व्यवस्था है कि ब्राह्मण होने के लिए उस का अपरिग्रही होना पहली कसौटी है
क्योंकि संपत्ति सामान्य रूप से सब भ्रष्टाचरण की जड़ है सब दोषो की जड़ है
जब कोई संपत्तिसंग्रह अपने मन से त्याग देता है
तो फिर उससे कोई अपराध होने की संभावना ही कहां रह जाती है
किंतु आप क्या कह रहे हैं ?
आप ठग को ,चांडाल को ,ब्राह्मण कह रहे हैं
इन दोनों में अंतर करना पड़ेगा 
जन्मना जाएते शूद्रः संस्कारात द्विज उच्चयते
यह मनु का कथन है 
जन्म से सभी शूद्र 
वर्ण कर्मानुसार

वेद प्रकाश भाई आप निश्चय रूप से विद्वान हैं | आप की कोई त्रुटि नहीं बताई जा सकती
अपना मंतव्य अवश्य प्रकट किया जा सकता है

कहना चाहूंगा कि 
जब आप ब्राह्मण शब्द का प्रयोग करते हैं तो ब्राह्मण का जो वास्तविक अर्थ है उसमें प्रयुक्त नहीं कर रहे

वेद प्रकाश भाई
 ठगो को आदर्श रूप प्रस्तुत करने वाले या मंदबुद्धि होते हैं या ठग ही होते है | 
हमारे यहा लगभग प्रत्येक पद के लिए अहर्ता निश्चित है । 
वही विशिष्ट वैशेषिकी का बोध कराता है । कुछ लोग यह चिन्हित कर पाते हैं अन्य उनका अनुसरण करते है । 
यही वैशेषिकी के कारण जो लाभ होता है धन मान यश का । कुछ लोभी बिना गुणों ( धर्म ) को धारण किए नील श्रृगाल की तरह स्वांग भरते हैं |
 पर हम (समाज )उनकी चिन्हार( जाति )बदल नहीं पाते |

 समाज के इस प्रमाद से वे बिना अहर्ता के भी वही कहलाते रहते है जो वस्तुतः वे नहीं हैं । 
इससे उन्हे ठगी करने में सहजता रहती है | 
वे गोदान के भोला की तरह होरी के बैल खोल लेते हैं । और होरी की असजगता या सरलता के कारण अपनी आत्मा को भी अपराध मुक्त अनुभव कराते हैं |
 जब कि सरलता का लाभ उठाना भी अपराध है । 

किंतु अब न मर्मज्ञ रहे न तज्ञ रहे ।
 वह होना होगा । 
शब्द प्रयोग के साथ सजग रहना होगा । अन्यथा ठगी होती रहेगी ।

दूसरी बात अहर्ता केवल ब्राह्मणों के लिए ही नहीं है । यह क्षत्रिय वैश्य और शूद्र पर भी लागू है । 
यदि मस्तिष्क पांव में स्थिर होगा फिर आप को ब्राह्मण के लिए पांव की ही उपमा देनी होगी ।
वर्ण का गौरव करके वह कार्य न करने वाला हमारे यहां चान्डाल कहा जाता है । 
आज संसार में दो ही वर्ण सबसे बडी संख्या में हैं । एक वर्णशंकर और दूसरे चाण्डाल । ये अपनी विचार शुद्धि के साथ अपने वर्ण का मान गौरव प्राप्त कर सकते हैं ।

38 वीं वर्षगांठमुझे सहेजने संवारने गौरवपूर्ण रखने के लिए आभारसरस नदी सी बहती होमेरे मन में रहती होमैं पत्थऱ घाट किनारे कातुम छ्ल छ्ल छूती रहती होविहगों सी है ऊंची उड़ानकोकिल कंठी सुर मधुर तानविमल नवल तुम धवल कंवलमैं कंटक युति सांवल सेमलतुम शांत सरल मर्यादा मेंमुझे पल पल सहती रहती होहिरण्यमयी द्युतिं कांति किरणमोहक मृदुला मधुहास अरूणतुम हो प्रभात की शुभ बेलामें काम क्रोध मद मंद-पुंजमै हूं ज्वर का उत्ताप श्रृंगतुम दल -दल झरती रहती होरति-स्पर्शो की अनुभूतिअंतरतम शीतल करती हैतुम सुमन कली सी लज्जा मेंमैं बौराया सा भंवरा हूंसंकोच मोच न हो पायातुम कल कल करती रहती होललित ललक दृष्टित अपलकतुम कृष्णबिंदु दिक् दैव झलकतुम संदल वन की मलय पवनमें नगर सभ्यता का उपवनखोकर मुझमें अपना वैभवस्व, हल-हल .पीती २हती होमहामना जगुप्त

38 वीं वर्षगांठ
मुझे सहेजने संवारने गौरवपूर्ण रखने के लिए आभार

सरस नदी सी बहती हो
मेरे मन में रहती हो
मैं पत्थऱ घाट किनारे का
तुम छ्ल छ्ल छूती रहती हो

विहगों सी है ऊंची उड़ान
कोकिल कंठी सुर मधुर तान
विमल नवल तुम धवल कंवल
मैं कंटक युति सांवल सेमल
तुम शांत सरल मर्यादा में
मुझे पल पल सहती रहती हो

हिरण्यमयी द्युतिं कांति किरण
मोहक मृदुला मधुहास अरूण
तुम हो प्रभात की शुभ बेला
में काम क्रोध मद मंद-पुंज
मै हूं ज्वर का उत्ताप श्रृंग
तुम दल -दल झरती रहती हो

रति-स्पर्शो की अनुभूति
अंतरतम शीतल करती है
तुम सुमन कली सी लज्जा में
मैं बौराया सा भंवरा हूं
संकोच मोच न हो पाया
तुम कल कल करती रहती हो

ललित ललक दृष्टित अपलक
तुम कृष्णबिंदु दिक् दैव झलक
तुम संदल वन की मलय पवन
में नगर सभ्यता का उपवन
खोकर मुझमें अपना वैभव
स्व, हल-हल .पीती २हती हो

महामना जगुप्त

न से नफरत लिखने वालोप से प्यार भी लिखना सीखोप से पुल बनाओ खाई परप से प्रेम के धागे जोड़ो ह हीन बोध को छोडोंह से अब हुंकारे सीखोब से बुरी बहुत बदमाशी यह समझो और लो शाबासीब से बांधो नेह के बंधनखोलो गांठे सभी अपावनहर घर में उजियार अंधेरा सांप पकड़ने बनो सपेराअ से अप्प दीप हो जाओउजियारे से प्रीत लगाओअंधियारों से रिश्ते तोड़ो सच समझो सच खुद से जोड़ोअपने लिए तो सब जीते हैऔरो को भी देना सीखोमरण मारना बहुत सरल हैजीवन देने के गुर सीखोसब को आता बड़ी बात क्या ?तलवारो से गले काटनासीखो ! सीख सको आ जाऐतलवारों से खेत जोतनागांव गली हर आंगन में तबखुशियों का मंगल छाएगाधरती पर्वत नदियां नाचेहर आंगन झूमे गाएगा घसिया तक ही नहीं उदासीपण्डिताईन ,भी बैठी भूखीभूख की जात कुजात न कोईभूख की चाहत केवल रोटी चैन प्रेम से मिल जाए बसमिले भले ही सूखी रूखीभूख भगाओ भय मिट्वाओकविता तब उपचार बनेगीमन महकाकर तन उमगाकरजीवन का उपहार बनेगीलिखने का श्रम सार्थक होगा सब की जैजै कार बनेगीसाम्यवाद हृदयों में होगा समाज की सरकार बनेगीपूंजी सबकी गांठ में होगीसमरसता सांसो में होगी कोई वाद विवाद न होगाउड़ान सभी पांखो में होगीहिले मिले और साथ चलेंएक यहीं संकल्प चाहिएसबका हित साधन साधक हो केवल वही विकल्प चाहिए मम

न से नफरत लिखने वालो
प से प्यार भी लिखना सीखो
प से पुल बनाओ खाई पर
प से प्रेम के धागे जोड़ो 
ह हीन बोध को छोडों
ह से अब हुंकारे सीखो
ब से बुरी बहुत बदमाशी 
यह समझो और लो शाबासी
ब से बांधो नेह के बंधन
खोलो गांठे सभी अपावन
हर घर में उजियार अंधेरा 
सांप पकड़ने बनो सपेरा
अ से अप्प दीप हो जाओ
उजियारे से प्रीत लगाओ
अंधियारों से रिश्ते तोड़ो 
सच समझो सच खुद से जोड़ो
अपने लिए तो सब जीते है
औरो को भी देना सीखो
मरण मारना बहुत सरल है
जीवन देने के गुर सीखो
सब को आता बड़ी बात क्या ?
तलवारो से गले काटना
सीखो ! सीख सको आ जाऐ
तलवारों से खेत जोतना
गांव गली हर आंगन में तब
खुशियों का मंगल छाएगा
धरती पर्वत नदियां नाचे
हर आंगन झूमे गाएगा 
घसिया तक ही नहीं उदासी
पण्डिताईन ,भी बैठी भूखी
भूख की जात कुजात न कोई
भूख की चाहत केवल रोटी 
चैन प्रेम से मिल जाए बस
मिले भले ही सूखी रूखी
भूख भगाओ भय मिट्वाओ
कविता तब उपचार बनेगी
मन महकाकर तन उमगाकर
जीवन का उपहार बनेगी
लिखने का श्रम सार्थक होगा 
सब की जैजै कार बनेगी
साम्यवाद हृदयों में होगा 
समाज की सरकार बनेगी
पूंजी सबकी गांठ में होगी
समरसता सांसो में होगी  
कोई वाद विवाद न होगा
उड़ान सभी पांखो में होगी
हिले मिले और साथ चलें
एक यहीं संकल्प चाहिए
सबका हित साधन साधक हो 
केवल वही विकल्प चाहिए 

मम29nov 23

उनके आगे बौने है पूरी तरह से छौने है हाँ उनसे भी दुबले है लेकिन वे तो पुतले हैंमम

 उनके आगे बौने है पूरी तरह से छौने है हाँ उनसे भी दुबले है लेकिन वे तो पुतले हैंमम


करो प्रकाशित दुखिया के सुख
सुखिया के उजियारे कर दो 
दीप कहे जय मेरी होगी
जितने चाहों अंधियारे भर दो

13nov 23 fb

छोटे छोटे लोभ गिराते बड़े बड़ो को
चढ़ बैठी है दीमक लग गई सभी जड़ो को 
 खेल भावना भूल-गए,ऐसी स्पर्धा
काट रहे हैं गले छोड़ कर गले-सड़ों को

18nov 23

तिलक लगा चोरी करी चोटी रख व्यभिचार
उसे न हिंदू जानिए वह धर्म विघातक स्यार

मम24nov 23 
संवाद पर होने लगे जब जब वाद विवाद
मौन सहेजो कृष्ण की गीता कर लो याद

-मम5nov 23

पत्थर पर खिला फूल हूँ 
हर अनय के लिए शूल हूँ
प्रतिभद्र हूँ अभद्र के लिए
धर्म के लिए ही अनुकूल हूँ

बॉह के नाग प्रकरण नहीं
अलंकर हैं शुभंकर हैं
हिंसक से भी हिंसा नहीं
यहां कंकर भी शंकर है
मेरा शौर्य है प्रतिरोधी
शूल के लिए मैं त्रिशूल हूँ
 
-मम
 
-मम

सिद्ध होए के पूर्व की दशा प्रसिद्ध कहाए
सिद्ध प्रसिद्ध का भेद जो जाने विद्य कहाए 
काग काग है काग से का तौले काकभुशुण्डि
जो जान गया है राम को तृप्ति सद्गति पाए

मम 19 Dec 2023
जहां न करना हो कुछ खर्चा
उस टॉपिक पर कर लो चर्चा

जहाँ पे होता हो जी खट्टा
जहाँ पे लगता हो कुछ बट्टा
जिस में होना हो कुछ रट्टा
वहां पे चुप्पी लुक्का छुप्पी
सुन कर सच खाजाते मिर्चा

राजनीति के घोर निदेशक
खेलो के महा-तज्ञ विशेषक
बढ़चढ कर करते संवाद
मुफ्त सलाह ढेरो बकवाद
बिना प्रार्थना पढ़ते पर्चा

मम 17 Dec 2023

दर्द बिना निर्माण न होता
पूछो अपनी माता से 
कितना दर्द सहा उसने
जन कर तुम्हें बढ़ाने में 
पी कर उसका खून ,आज 
शर्म नहीं गुर्राने में

कभी गिने क्या ?
कितने कत्ल हुए ,
लहराने अपने 
विश्वासों का परचम
विश्वासों की आड लूटा
कितनी श्रद्धाओं का आंगन
टूट गई जब जब तलवारें
 कितने छल छंदो को बोया
छलनी छलनी हुई मनुजता
जार जार आकाश भी रोया 
फिर भी बेशर्मी है लादी
खून को रंग बताने में

आक्रामक की और रक्षक की 
हिंसा में समता बतलाते
अब भी रंगे सियार बोटियां
लेकर आड मजहब की खाते
बडी बडी बातों में उलझा
सरल मनों को फांस रहे हैं
हूरों के सपने दिखला कर
टिकट मौत के बांट रहे है
 मजहब के धंधे में माहिर
सच को झूठ बनाने में

मम 16 Dec 2023

अपना अध्यवसाय जोड़नाउनका है व्यवसाय तोड़नातोड़फोड़ में मगन खूब वेहमको भी क्यों राह छोड़ना ?उनकी करनी भिन्न कथन सेबे-परवाह उत्थान पतन से वेदनाओं पर पाक बनातेछौंक घृणा का खूब लगातेवे विखेरते फूट के काँटेहमको तो है सब समेटनाउनका वातावरण कोड़नावे नित देते घाव जगत कोहम औषधि आलेपन तत्परदिखने में तो समान ही है हैं विलोम वृत्ति में परस्परवे विष का आरोपण करतेहमें हलाहल है निर्मूलनासारे ही विषदंत फोड़नाछ्ल छन्दों के उनके शोरअपनी प्रार्थनाओं से भोरउनकी अमा निशा से प्रीत दिनकर है अपना मनमीतउनको प्रिय है बैर बढ़ानाहम को भाता प्रेम सींचनाचाहें मन उनके भी मोड़नामम

अपना अध्यवसाय जोड़ना
उनका है व्यवसाय तोड़ना
तोड़फोड़ में मगन खूब वे
हमको भी क्यों राह छोड़ना ?

उनकी करनी भिन्न कथन से
बे-परवाह उत्थान पतन से 
वेदनाओं पर पाक बनाते
छौंक घृणा का खूब लगाते
वे विखेरते फूट के काँटे
हमको तो है सब समेटना
उनका वातावरण कोड़ना

वे नित देते  घाव जगत को
हम औषधि आलेपन तत्पर
दिखने में तो समान ही है 
हैं विलोम वृत्ति में परस्पर
वे विष का आरोपण करते
हमें हलाहल है निर्मूलना
सारे ही विषदंत फोड़ना

छ्ल छन्दों के उनके शोर
अपनी प्रार्थनाओं से भोर
उनकी अमा निशा से प्रीत 
दिनकर है अपना मनमीत
उनको प्रिय है बैर बढ़ाना
हम को भाता प्रेम सींचना
चाहें मन उनके भी मोड़ना

मम
12nov 2023 fb 

अपना अध्यवसाय जोड़ना
उनका है व्यवसाय तोड़ना
तोड़फोड़ में मगन खूब वे
हमको भी क्यों राह छोड़ना ?

उनकी करनी भिन्न कथन से
बे-परवाह उत्थान पतन से 
वेदनाओं पर पाक बनाते
छौंक घृणा का खूब लगाते
वे विखेरते फूट के काँटे
हमको तो है सब समेटना
उनका वातावरण कोड़ना

वे नित देते घाव जगत को
हम औषधि आलेपन तत्पर
दिखने में तो समान ही है 
हैं विलोम वृत्ति में परस्पर
वे विष का आरोपण करते
हमें हलाहल है निर्मूलना
सारे ही विषदंत फोड़ना

छ्ल छन्दों के उनके शोर
अपनी प्रार्थनाओं से भोर
उनकी अमा निशा से प्रीत 
दिनकर है अपना मनमीत
उनको प्रिय है बैर बढ़ाना
हम को भाता प्रेम सींचना
चाहें मन उनके भी मोड़ना

मम