Saturday, October 27, 2018

अनमना है गगन और धरा मौन रै

अनमना है गगन और धरा मौन है
किंचित है विचलित मन समीर का
तमतमा गया मुख सूर्य का
खुल गया है कोई स्कंध पीर का

कर २ही है निर्जला राहीओं की देह
धूम्रध्वज लिए आवेग में पवन
धूलधूसरित आकाश हो गया
हुलस मलिन  है धूप में सुमन
भोर से प्रखर हो ग्ए दिनकर
याचित हुए , गुहा और विवर
ववंडरों के डर सहमीं गुमटियां
तरस रहे हैं बादलों को मन
सुलग उठे हैं विटपों के तन
खौल गया है धीर नीर का

लय ताल छोड़कर न्यायी दिगभ्रमित
पीट रहे हैं ढोल और मृदंग
गणमान्य और प्रवर अधिमान्य विप्रवर
नाच रहे हैं उन्मत्त हो अनंग /चढ़ा भंग
क्रंद मंद हो सिसकिया हुआ
अबोध बन रहे संस्थान और स्तंभ
रूठने लगा स्वभाव मौज का
छूटने लगा साहस समाज का
टूटने लगा पिचकारियों का दम
उड़ गया है रंग मुख से अबीर का

Thursday, August 9, 2018

प्रीत तुम्हारी गाते गाते

प्रीत तुम्हारी गाते गाते
गीतो का आगार हुआ
गाते गाते रूप तुम्हारा
मैं स्वतः श्रृंगार हुआ

कज्जल अपने उर लेते हैं
गहरे सरोवरो के तल
पिपासुओं के निमित्त प्रियवर
सतह सहेजें जल निर्मल
जीवन के दुर्गम पथ थे
सुविधा के जर्जर रथ थे
चंदन मन का संबल पाकर
मार्ग सहज निर्भार हुआ

कामनाओं के ववंडरों में
आंखों चुभते खंड सपन
राग मोह के लोभ दहकते
अभिमानों के ईर्ष्या वन
किंतु सौम्य शीतलता देती
सलिलातट सी सुवस पवन
संस्पर्शों का अमृत पाकर
मृदा रसज अवतार हुआ

अभिलाषा के ऊंचे अंबर
चातक मन की मौन घुटन
अभिव्यक्ति के सीमित अवसर
कीलित कलुषित वातायन
किंतु घटा में चन्द्रप्रभा सी
विखराती मृदुहास कुसुम
कोमलता का संबल पाकर
निर्जन अजर विहार हुआ

महामना

Saturday, August 4, 2018

देखता है समय सच को

देखता है समय सच को अचकचाकर
हंस रहे हैं झूठ सारे खिलखिलाकर

रातभर तरसे थे हम जिस अरूणिमा को
अरूण भी न ला सका उस लालिमा को
सिंहासनों पर आ विराजीं बदलियां
जयघोष कर गरजीं गिरीं फिर बिजलियां
डर गई सारी छतें , आवाज मिमियायी
हर स्वाभिमानी किरण लौटी तिलमिलाकर

भेड़िए निकले जिन्हें समझा गऊ था
चाटते थे वे जिसे ' अपना लहू था
आश्चर्य !( आह रे ) कैसे निरापद रह सके हम
पौ फटे आंखें फटीं थे गिद्ध हमदम
धिक इन्हें पोसा समझ कर  सर्वहारा
देखता ही रह गया मन डवडबाकर

इस दौड़ में रुकना औ मरना है बराबर
दिख रहा सच ' झूठ है लेकिन सरासर
छद्म युग है धर्म संस्थापन जटिल है
युक्ति का आश्रय करें शत्रु कुटिल है
सन्निकट सत्क्रांति  है धीरज न खोना
कल रोएगें ये ऊंट सारे बिलबिलाकर

जिन तेवरों से बात करनी थी उन्हें
वे अभी गिरवीं हैं सत्ता के चरण में
फस गए हैं पंरव गुड़ की ढेलियों में
३सलिए है दोगलापन आचरण में
वाह गजब के तीर हैं तरकश में उनके
छिन गई सत्ता तो लाएं हैं सजाकर

Wednesday, June 6, 2018

जिनकी दृष्टि समान होती है

जिनकी दृष्टि समान होती है
उनकी सृष्टि महान होती है
जिनके मन सध गई समता
उनकी व्यष्टि विवान होती है
मन की जब बात नहीं बनती
भौंह तन के कमान होती है

मठ पर चोरों का कब्जा है

मठ पर चोरों का कब्जा है
और ठगों की पहरेदारी
सभी देव नीलाम हो गए
ऐसी बोल रही मक्कारी

प्रामाणिकता ही अयोग्यता
कायरता ही अनुशासन है
सच कहते लकवा जिव्हा को
कालनेमि सत्ता पे भारी

लूट लिए विश्वास उन्होंने
भारी योग्य समझ कर जिनको
ऋषि संत सब सौंप गए थे
भांति - भांतिं की थाती सारी

वामन रूप धरे है  रावण
नितप्रति श्री अपहृत होती है
समरसता के ढोल बजाते
जातिवाद के बड़े पुजारी

कर्णद कुंभ हुए हैं मद में
परम्पराए शील खो रही
आर्तनाद सब शोर खा गया
पसर गई चहुं दिशि लाचारी

यद्यपि शुभ है शेष अभी भी
शौर्य और भक्ति शक्ति भी
वीर प्रसूता भारत माता
पुनः बनेगी दुष्ट संहारी

तड़प रही है विकल वेदना
जाग रही है किंतु चेतना
राम विभीषण हनुमत मिललें
मिट जाएगी सब बीमारी

जब भी कोई अपने मुख पर किरणें मलता है

जब भी कोई अपने मुख पर किरणें मलता है
अंधकार छाया हो पीछे- पीछे चलता है

कितना ही गठबंधन कर ले तमस हवा के साथ
दिया- हथेली साथ रहें तो उसकी कौन बिसात
जहां कहीं भी कीचड़ कचरे रोज पनपते हैं
हम उनकी ही छाती पे पंकज से खिलते है
माना अपना मन कठोर है नहीं पिघलता है
पर बाती के संघर्षों में यह घी सा जलता है

तू अंधियारों का अनुगामी मै सहचर सूरज का
तुझको अपने पाले करना,काम बड़े धीरज का
है मनुज वही,जो असाध्य को,संभव करता है
अपने बलिदानों से जगती प्राणवान करता है
माना मन है शीत शिला सा , न ही विकलता है
किंतु लोक की शिवता को यह पलपल गलता है

सच से परदा कर लोगे तुम ऐसी आस न थी
आज खुला सच' हममें तुममें वैसी रास न थी
ऐसे शिखरों का क्या जिस पर पांव न ठहरे 
वह प्रभुता क्या,जहां दंभ पाताका फहरे
अपनी कितनी भी ऊंचाई नहीं सफलता है
वही उच्च है जहां समष्टि-सेवाव्रत पलता है

हम अंधियारे के मुख पर नित सूरज मलते है
अंधकार ' छाया हो , आगे पीछे चलते हैं

सह लेंगे

सह लेंगे मंहगाई भी
सो लेंगे बिना रजाई भी
इतना वादा दो खुद को
तो कर दे सरकार चढ़ाई भी

न धेला दे  , न बतलाए
गोला बारूद कहां से आए
बड़ा मुआवजा जीत चाहिए
फोकट में हर चीज चाहिए

जब बैठे गलबहिया करने
अपने सारे कष्ट बताए
महरी सेवक का शोषण करते
लाला किंचित नहीं लजाए

ऐसे ऐसो को ऐशों का
सारा साजो साज चाहिए
नहीं कभी कोईं राह बनाई
लक्ष्य रोज एवरेस्ट चाहिए

मरने को सेना से कह दो
खुद को घर भरपूर चाहिए
चीन्ह चीन्ह कर रेवड़ बाटें
जग को समरस गीत चाहिए

रिश्तेदार मलाई मारें
जाति वाले ओहदे पालें
ऐसे झूठे मक्कारों को
जनता के प्रणाम चाहिए

महामना

Saturday, January 27, 2018

आभार

आभार हर शुभ ऐष्णा का
आभार हर शुभभावना का
आभार हर शुभ कामना का
आभार हर आराधना का

संच में जो हैं सुसज्जित
आभार उनकी साधना का
मंच पर जो हैं विराजित
आभार उनकी प्रेरणा का

राष्ट्रहित क्षण क्षण समर्पण
भारती की आरती में प्राण अर्पण
हवि हुए गा गीत वंदेमातरम् का
आभार  हर शुभकामना का

प्रत्यक्ष में हैं चार दिन से साथ
पर है अनवरत माथे पें उनका हाथ
लक्ष्य तक लाए संकल्प रथ को खींच
आभार श्रम स्वेद की आराधना का

आभार सबकी प्रेरणा का
आभार सबकी साधना का
आभार हर शुभ कामना का
आभार हर आराधना का

धन्यवाद

हमारे प्रिय बाबा योगेन्द्र

अब पद्यश्री विभूषित
हमारे प्रिय बाबा योगेन्द्र

मनुज हित में कला होजाए
यह पुरुषार्थ कर डाला
राष्ट्रहित हो कला साधन
जगत में भाव भर डाला
सभी के ह्रदयप्रिय महेन्द्र
हमारे प्रिय बाबा योगेन्द्र

दधीचि सम संकल्पित साध
भीष्म सम दृढता अनत अगाध
संघ साधना है सर्वोपरि
स्वयं से सिद्ध कर डाला
लोकमें करुणामय सत्येन्द्र
हमारे प्रिय बाबा योगेन्द्र

अहा यह उज्जवल देवमूर्ति
हृदयों में बसी प्रेम सत्कीर्ति
मातृवत सबको दुलराने
स्वयं को होम कर डाला
अनुष्ठानों के प्रज्ञा केन्द्र
हमारे प्रिय बाबा योगेन्द्र

अपरिग्रह जहां विनीत हुआ
प्रवास ही जीवन गीत दुआ
मधुरतम शब्दों का आगार
कला पाती जिनसे श्रृंगार
कलाधर निश्छल स्वयं मृगेन्द्र
सर्वप्रिय बाबा श्री योगेन्द्र

पद्म श्री जिनसे आभा पाए
सरलता जिनको छू के आए
विनय होजाए विनत जहां
दृष्टि समरसता पाए यहां
जलज पंकज से ये पुष्पेन्द्र
हमारे प्रिय बाबा योगेन्द्र

जगदीश 'महामना"

Sunday, January 21, 2018

सरस्वती वंदना



सर्जना

Sunday, January 17, 2010

वसंत पंचमी की शुभ कामनाए

सरस्वती वंदना



भावनाओं में ,कामनाओं में ,शौर्य सुधा भर दे 

वीणा वादिनी ,मातु शारदे ,,राष्ट्र भक्ति वर दे 

नीति सन्मति ,सत्य संस्कृति ,सम-आदर ,विश्वास 

समता-समरसता के पथ पर दृढ़ प्रतिज्ञ अनुप्रास 

अजर-दिव्यता ,अतुल-भव्यता ,,'पूर्ण प्रतिष्ठा दे 

सहयोगी सह-भागी भारत , संकुल निष्ठां दे 

विज्ञ -तग्यता ,ओज, सभ्यता ,विनत विश्व आकाश 

अंतर भारत के जीवन में ,प्रबल -प्रेम,नित्-हास

गुडानुरागी, व्यसन-विरागी तरुण ,सुविद्या दे 

धर्मं-अधिष्ठित अखंड भारत ,योगी प्रज्ञा दे 

समुचित वृष्टी ,नियमित ऋतुयें , धान, मान ,दिनमान 

गौरव पूरित सदय ह्रदय में ,शक्ति-मान अभियान 

आत्मा-चेतना , विश्व-योजना , श्रम-तत्परता दे

दुर्जन-हन्ता, सज्जन भारत ,, सत -उर्वरता दे

गर्दूं-गाफिल at 10:39 AM

10 comments:

योगेश स्वप्नJanuary 17, 2010 at 4:37 PM

समुचित वृष्टी ,नियमित ऋतुयें , धान, मान ,दिनमान

गौरव पूरित सदय ह्रदय में ,शक्ति-मान अभियान

आत्मा-चेतना , विश्व-योजना , श्रम-तत्परता दे

दुर्जन-हन्ता, सज्जन भारत ,, सत -उर्वरता दे ,

bahut khoobsurat panktian, ati sunder rachna. badhaai............. aameen.

Reply


सर्वत एम०January 17, 2010 at 9:26 PM

नीति सन्मति ,सत्य संस्कृति ,सम-आदर ,विश्वास

समता-समरसता के पथ पर दृढ़ प्रतिज्ञ अनुप्रास

अजर-दिव्यता ,अतुल-भव्यता ,,'पूर्ण प्रतिष्ठा दे

सहयोगी सह-भागी भारत , संकुल निष्ठां दे 
अवाक कर दिया भाई. माँ सरस्वती से प्रार्थना में जो-जो वर मांगे, जिस अंदाज़ में मांगे, जिस भाषा-व्याकरण, सौष्ठव में मांगे, उसने मुग्ध कर दिया. आप की लेखनी उत्तरोत्तर कविता के शिखरों को न केवल छू रही है, बल्कि उन पर विराजमान होती जा रही है. मन करता है, आपकी लेखनी की प्रशस्ति में एक गीत लिख डालूँ. लेकिन डर लगता है, बाकी ब्लागर बन्धु नाराज़ हो जाएँगे. इस लिए थोड़े लिखे को बहुत समझना और लौटती डाक से जवाबभेजना.
अंत में, माँ सरस्वती की असीम अनुकम्पा है आप पर.

Reply


वन्दना अवस्थी दुबेJanuary 18, 2010 at 4:03 AM

बसन्तपंचमी के पहले ही कितना सुन्दर गीत मिल गया. बधाई.

Reply


अल्पना वर्माJanuary 19, 2010 at 1:02 AM

बसंत पंचमी की शुभकामनाएँ. 
बहुत ही सुंदर कविता है क्या कहें... 
हिन्दी के इतने सुंदर शब्दो का प्रयोग किया है. 
बहुत ही बहुत अच्छी रचना! 
बधाई!

Reply


psinghJanuary 22, 2010 at 3:00 AM

wah bahut khub
bahut bahut abhar

Reply


shamaFebruary 1, 2010 at 6:39 AM

Yahi dua apne liyebhi karungi..ki, ma Sharda sada desh bhaktee ka jazba manme banaye rakhe!

Reply


kshamaFebruary 1, 2010 at 6:43 AM

भावनाओं में ,कामनाओं में ,शौर्य सुधा भर दे

वीणा वादिनी ,मातु शारदे ,,राष्ट्र भक्ति वर दे 
Chahun to yahi chahun!

Reply


kshamaApril 24, 2010 at 10:44 AM

विज्ञ -तग्यता ,ओज, सभ्यता ,विनत विश्व आकाश

अंतर भारत के जीवन में ,प्रबल -प्रेम,नित्-हास

गुडानुरागी, व्यसन-विरागी तरुण ,सुविद्या दे

धर्मं-अधिष्ठित अखंड भारत ,योगी प्रज्ञा दे 
Aaj phir ekbaar padhi yah rachana...ek shabd idhar udhar nahi...ek bahti sarita-sa pravah..gazabka fan hasil hai aapko!

Reply


vibha rani ShrivastavaJanuary 30, 2014 at 5:31 AM

मंगलवार 04/02/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगाhttp://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
आप भी एक नज़र देखें 
धन्यवाद .... आभार ....

Reply


Kaushal LalFebruary 3, 2014 at 7:57 PM

जय माँ सरस्वती....शुभ कामनाए

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मत दायित्वों से भागों अब

अपने अपने हृदय जगाओ ' शौर्य जगाओ जागो अब
समय देश का आया है ' मत दायित्वों से भागो अब

निष्ठाओं पर ग्रहण लगाने ' अनगिन राहू केतू हैं
अंधकूप वाचाल हो रहे, सबके अपने हेतु हैं
अनय कूट की मूर्च्छा हर ' अमिय बांटने निकलो अब
निर्बल दीन हीन जीवन का तिमिर छांटने निकलो अब

नीति न्याय का समय उठे तम को यह स्वीकार नहीं
लोभ निगल लेता मूल्यों को ,सत्य को अब सत्कार नहीं
कटु दुर्नीति दमन करो, संस्कृति जगाने निकलो अब
बन रामकृष्ण 'बन महावीर' देवत्व जगाने निकलो अब

धनपशुओं को नहीं सुहाते ' सेवा, नवल प्रबंधन ' हाँ
कुलटा कूटों को ही भाते ' आंधियारे गठ्वंधन हां
शुद्ध बनो, नवबुद्ध बनो ,नववोध दिलाने निकलो अब
जनमन के दारिद्रय हरण' श्री बुद्धि खिलाने निकलो अब

साहित्य हमारा साधन सारस्वतजन संसाधन

Sunday, July 5, 2015



साहित्य हमारा साधन सारस्वतजन संसाधन
निश्चित है लक्ष्य हमारा भारत को विश्व सिंहासन

पग पग पर नीर बदलता पग पग बदले भाषाएँ
एक सूत्र हम सब का योगी हों दसों दिशाये
हम प्रज्ञा के अर्चक हैं, हम नीति के निर्माता
हम ऋषि तत्व के साधक हम भारत भाग्य विधाता
संस्कृति उत्थान करेंगे जय मंगल गान करेंगे
गूंजेगा सकल जगत मेँ भारत का विधि अनुशासन

साहित्य हमारा साधन सारस्वतजन संसाधन
निश्चित है लक्ष्य हमारा भारत को विश्व सिंहासन

निज गौरव की विस्मृति से,हा! हतबल राष्ट्र हमारा
निर्बलता का कारण है ,यह जाति पंथ बंटवारा
निर्वीर्य हुए सौ  कोटि ,तज धर्माधारित जीवन
दु:खों से मुक्त न कोई , बालापन वृद्धा यौवन
अंतर की त्याग मलिनता ,बाहर करने अरिमर्दन
संकल्पित तेज जगाने ,करना है धर्म -स्थापन

साहित्य हमारा साधन सारस्वतजन संसाधन
निश्चित है लक्ष्य हमारा भारत को विश्व सिंहासन

3:52PM, 16/02/2015] jgdis Gupt:महामना


गर्दूं-गाफिल at 11:48 PM

हम निकट नहीं तो क्या

Sunday, July 5, 2015


हम निकट नहीं तो क्या
मै साथ नहीं तो क्या
मेरे हिस्से का टीका
माथे पे सजा लेना
गालों को गुलालो स े
रच लेना भिगो लेना

स्नेह वलय सारे
तुमपर ही निछावर है
स्मृतियों की गागर में
छवियों के सागर हैं
मन के दर्पण में
वह समय जगा लेना
मेरे हिस्से का टीका
माथे पे सजा लेना

त्यौहार ये रंगो का
संजीवन का अवसर
द्वार आ खड़ा है
सत शुभ कॉवर लेकर
जीवन के कटु कल्मष
होली में जला देना
मेरे हिस्से का टीका
माथे पे सजा लेना

रंग भरी भंग भरी शुभकामनाएं

जगदीश गुप्त महामना
[9:49AM, 05/03/2015] jgdis Gupt:

गर्दूं-गाफिल at 11:52 PM

भंग के उमंग के तरंग के

Sunday, July 5, 2015


भंग के उमंग के तरंग के
झांझ के सितार के मृदंग के
आ गए अबीर के गुलाल के
पल ये संगसाथ के धमाल के

अंग अंग फूलती कुंअर कली
मंद मंद मेदनी पवन चली
मन मलय तन प्रलय अनंग के
पल कमल किलोल के कलाल के
आ गए अबीर के गुलाल के
पल ये संगसाथ के धमाल के

देह नेहपान को तृषित द्रवित
लौ जगी धूम्र छंट गए दमित
डाल डाल डोलते विहंग के निहंग के
फुर्र हुए छण सभी कसाल के
आ गए अबीर के गुलाल के
पल ये संगसाथ के धमाल के
[2:17AM, 01/04/2015] jgdis Gupt:

गर्दूं-गाफिल at 11:53 PM

छोटी छोटी खुशियों से ही बड़े बड़े गम गलते हैं

Sunday, July 5, 2015


अतीत के झरोखे से

13/10/1996 के राजनांदगांव के सबेरा संकेत में प्रकाशित रचना का आस्वादन कीजिए

छोटी छोटी खुशियों से ही बड़े बड़े गम गलते हैं
एक चिराग महकता है तो बड़े अंधेरे ढलते हैं

पलकों पर बिखरे हैं सपने खो न देना राहों में
कदम दर कदम चलने से मंजिल के दर मिलते हैं

मामूली तकरारों से ही रोज बिखरते हैं रिश्ते
ज़र्रा ज़र्रा कतरों से ही बड़े हिमालय मिलते हैं

उकसावों में उगल न देना अंगारों की ओर हवा
हल्की सी इक चिंगारी से बड़े बड़े घर जलते हैं

रोज रोज की मुस्कानों ने रिश्ते कई सहेजे हैं
बूंद बूंद बारिश से 'ग़रदूं' दरिया कई निकलते हैं

हम सब हैं लाचार सुनो ऐ ज़ुल्म सितम ढाने वालो
मजलूमों के वोट मगर सरकारें कई बदलते हैं

मीठी नज़रों की खुश्बू से खुश होता मन का मधुवन
मीठी प्यारी बोली से ही मौसम कई बदलते हैं
[1:38AM, 04/04/2015] jgdis Gupt:

नीयत और नियति

 लगभग २० साल पहले एक चिंता कविता होकर उतरी थी
आज माननीय मोदी जी के बैंगलोर में भाषण का आरंभ के मनोभाव सुन कर मन किया इसे आप से साझा करने का

नीयत और नियति

नीयत ना बदलेंगे तो फिर
नियति भला कैसे बदले
नियति वही रहना है तो
सरकार बदल कर क्या हासिल ?

कुछ लोग बदल जायेंगे बस
कुछ समीकरण हों परिवर्तित
नहीं बदलना है गर दिल
चेहरों को बदल कर क्या हासिल?

हवन यदि फिर भी पठ्ठों के हाथ रहा
और राज दंड भी उद्दंदों के साथ रहा
गीले कंडों की समिधा धुआं करेगी ही..
पंडे और पंडाल बदल कर क्या हासिल?

वंचित को शक्ति ना मिल पाए
मूक ना अभिव्यक्ति पाए
यदि लूट बरामद हो ना सके
धावों दावों से क्या हासिल?

मन आवर्धन बिना नहीं संभव परिवर्धन
सहकार करो,आराध्य बनाओ गोबर्धन
यदि पीर न जाए पांवों की
 तो पीर पूज कर क्या हासिल

पापी मन ले सुरसरि कैसे होगी साफ
अपनों  में ही अटके हैं ,करिएगा माफ
 यदि मन  की पावनता लक्छय नहीं
निर्मल गंगा से क्या हासिल
[12:37AM, 04/04/2015] jgdis Gupt:

हो गया छवि देखकर मैं मुग्ध जिसकी

Sunday, July 5, 2015


एक वर्षों पुराने खुदरा कागज से सहेज ली आज एक अनगढ़ रचना

हो गया छवि देखकर मैं मुग्ध जिसकी
आ रहा आभार है उस मूर्तिका पर
मन मालिनी मकरंद रज की भूमिका में
छा गई है मन भुवन की बुर्जिका पर

ग्यात से अग्यात के पथ पांव अनुचर
धूप से सुख छांव तक के नित्य सहचर
अभिमाननी आंख में उतरा प्रणयपल
माधुर्य आया तब भंवरती गीतिका पर

आह्लाद के आभार में श्रृगांर कर आई
मधुरिमा प्रतिदान का संकेत कर आई
प्रतिदृष्टि में कौंधी धजा विद्युल्लता सी
लावण्य भर आया सहमती रीतिका पर

[12:25AM, 05/04/2015] jgdis Gupt:

कांच कंचन हुआ मन वृंदावन हुआ

सर्जना

Monday, July 6, 2015

आज नगर के सिद्ध और  समर्थ गीतकारों के बीच यह गीत पढ़ने का संयोग बना | सौभाग्य से सबने सराहा|
एक मांग भी आई कि इसमें वृद्धि की जाए | यह प्रयास किया है |हमारे मंच के विशेषग्यों से मुक्त सुझावों  की अपेक्छा है  |
जो स्वयं को विशेषग्य नहीं मानते वे भावपक्छ पर सुधार और उसके प्रभाव सुझाएं |  स्मरण रहे आज जो प्रशंशा हुई उसका श्रेय वस्तुतः इस मंच के विशेषग्यों को जाता है क्यों कि यहां से पास होने के कारण ही मैने आज रचना
पाठ किया |
सामान्यतः मेरी रुचि सुनने में ही अधिक है|

कांच कंचन हुआ मन वृंदावन हुआ

कांच कंचन हुआ मन वृंदावन हुआ
 पांव पायल हुई बावरी बावरी
गंधरस मेँ पगी रुप की माधुरी
भोर होते हुई पांखुरी पांखुरी

स्वर सुधा साध कर रागिनी सुरमई
द्रुत विलंबित हुई मध्यमा छुईमुई
दृश्यमय हो गए गीत गोविंद के
तार सप्तक अधर हो गए बांसुरी

सर से सरकी चुनर,धूप निखरी इधर
 भोर का छोर तज मुख हुआ दोपहर
रश्मिरथ पे चढ़ा सूर्य आगे बढ़ा
सांझ की लालिमा हो गई सांवरी

रच गई अल्पना सच हुई कल्पना
व्योम पर छा गया एक बादल घना
तूलिका हंस पड़ी रंग नर्तक हुए
 लय हुई देह की  भांवरी भांवरी

[11:48PM, 05/04/2015] jgdis Gupt

कितने प्रश्न निरूत्तर होकर झेल रहे उपहास

सर्जना

Thursday, April 9, 2009

कितने प्रश्न निरूत्तर होकर झेल रहे उपहास

नहीं दिखती है कोई आस ,नहीं दिखती है कोई प्यास

...............................................

मेल ने अनबोला साधा , अनुभव ने मींची आँख

सद्भावों के पंछी लुंठित, कटे दया के पांख

सुख उतरा है निगुणो पर, और सदगुण खडे उदास

नहीं दिखती है कोई आस ....................

चिन्तन के सर पीड़ा भारी,शौर्य के मुख पर कालिख कारी

मित्र भावः के द्वार बंद हैं , लाज निर्वसन हुई बेचारी

सत्य हुआ तप हीन और विश्वास हुआ निः श्वास

नहीं दिखती है कोई आस .......................

सारी मर्यादाएं कलंकित ,भलमनसाहत है आतंकित

मुंह देखे की कहे प्रतिष्ठा ,मानवता का मन है शंकित

विनम्रता मतलब की मारी, डग डग आलस का वास

नहीं दिखती है कोई आस ......................

गर्दूं-गाफिल at 10:30 AM

चांदनी से भरे मुट्ठियां

सर्जना

Sunday, April 19, 2009

चाँदनी से भरे मुट्ठियाँ
लीपती मैं रही चिट्ठियां

आंचल में बिखरे हुए
पलको में उलझे हुए
सपनों को सिलती रही
बरसती रहीं बदलियाँ

मधुबन कई बुन लिए
टांके कई इन्द्रधनु
ममता को तुर्पते हुए
घायल हुई उँगलियाँ 

सितारों को जड़ते हुए
वसंतों को मढ़ते हुए 
जरीदारधागों में लिपटीं 
उलझतीं रहीं गुत्थियाँ

गर्दूं-गाफिल at 11:37 AM

तो मानें तुम्हें

पाप के गीत गाकर कमाते हो तुम
पुण्य के गीत गाओ तो जानें तुम्हें
जो समाचार है नित्य अखबार में
इससे हट कुछ बताओ तो मानें तुम्हें

जो सुनाओगे तुम,बो के जाओगे तुम
कल बढ़ेगा वही ,फिर फलेगा वही
भ्रष्ट हैं हम सभी, धृष्ट हैं हम सभी
हमको सज्जन बनाओ तो मानें तुम्हें

कौन सी दृष्टि लेकर डगर में हो तुम
देख पाते नहीं कुछ सिवा पाप के
ढूढ़ते फिर रहे सिर्फ बीमारियां
कुछ दवाऐं बताओ तो मानें तुम्हें

चन्द्र हर्षित नृत्यरत ' चन्द्र की आभा चहूं

चन्द्र हर्षित नृत्यरत ' चन्द्र की आभा चहूं
इस निविड़ एकान्त में ,कैसे अकेला मैं रहूं

प्रिय पार हो तुम व्योम के ' मैं अधूरा धूम्रवत
विरहवेदी पर स्मृति में, मैं स्वयं आहुतिवत
कालिमा से लालिमा तक ,है क्या प्रतिक्षा के सिवा
आत्मरति के विप्लावों को भोर तक कैसे सहूं

सो रहा है जगत आधा प्रियस्थिति के अंक में
भाग्यशाली भ्रमर विलसित सहकमलिनी पंक में
इस निशा में भी कलुष कूटों की काली छांव है
क्रोध में करूणा है मेरी ,है मन विकल किससे कहूं

महामना ग़रदूं