Sunday, April 19, 2009
चाँदनी से भरे मुट्ठियाँ
लीपती मैं रही चिट्ठियां
आंचल में बिखरे हुए
पलको में उलझे हुए
सपनों को सिलती रही
बरसती रहीं बदलियाँ
मधुबन कई बुन लिए
टांके कई इन्द्रधनु
ममता को तुर्पते हुए
घायल हुई उँगलियाँ
सितारों को जड़ते हुए
वसंतों को मढ़ते हुए
जरीदारधागों में लिपटीं
उलझतीं रहीं गुत्थियाँ
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