चन्द्र हर्षित नृत्यरत ' चन्द्र की आभा चहूं
इस निविड़ एकान्त में ,कैसे अकेला मैं रहूं
प्रिय पार हो तुम व्योम के ' मैं अधूरा धूम्रवत
विरहवेदी पर स्मृति में, मैं स्वयं आहुतिवत
कालिमा से लालिमा तक ,है क्या प्रतिक्षा के सिवा
आत्मरति के विप्लावों को भोर तक कैसे सहूं
सो रहा है जगत आधा प्रियस्थिति के अंक में
भाग्यशाली भ्रमर विलसित सहकमलिनी पंक में
इस निशा में भी कलुष कूटों की काली छांव है
क्रोध में करूणा है मेरी ,है मन विकल किससे कहूं
महामना ग़रदूं
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