Sunday, January 21, 2018

नीयत और नियति

 लगभग २० साल पहले एक चिंता कविता होकर उतरी थी
आज माननीय मोदी जी के बैंगलोर में भाषण का आरंभ के मनोभाव सुन कर मन किया इसे आप से साझा करने का

नीयत और नियति

नीयत ना बदलेंगे तो फिर
नियति भला कैसे बदले
नियति वही रहना है तो
सरकार बदल कर क्या हासिल ?

कुछ लोग बदल जायेंगे बस
कुछ समीकरण हों परिवर्तित
नहीं बदलना है गर दिल
चेहरों को बदल कर क्या हासिल?

हवन यदि फिर भी पठ्ठों के हाथ रहा
और राज दंड भी उद्दंदों के साथ रहा
गीले कंडों की समिधा धुआं करेगी ही..
पंडे और पंडाल बदल कर क्या हासिल?

वंचित को शक्ति ना मिल पाए
मूक ना अभिव्यक्ति पाए
यदि लूट बरामद हो ना सके
धावों दावों से क्या हासिल?

मन आवर्धन बिना नहीं संभव परिवर्धन
सहकार करो,आराध्य बनाओ गोबर्धन
यदि पीर न जाए पांवों की
 तो पीर पूज कर क्या हासिल

पापी मन ले सुरसरि कैसे होगी साफ
अपनों  में ही अटके हैं ,करिएगा माफ
 यदि मन  की पावनता लक्छय नहीं
निर्मल गंगा से क्या हासिल
[12:37AM, 04/04/2015] jgdis Gupt:

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