प्रीत तुम्हारी गाते गाते
गीतो का आगार हुआ
गाते गाते रूप तुम्हारा
मैं स्वतः श्रृंगार हुआ
कज्जल अपने उर लेते हैं
गहरे सरोवरो के तल
पिपासुओं के निमित्त प्रियवर
सतह सहेजें जल निर्मल
जीवन के दुर्गम पथ थे
सुविधा के जर्जर रथ थे
चंदन मन का संबल पाकर
मार्ग सहज निर्भार हुआ
कामनाओं के ववंडरों में
आंखों चुभते खंड सपन
राग मोह के लोभ दहकते
अभिमानों के ईर्ष्या वन
किंतु सौम्य शीतलता देती
सलिलातट सी सुवस पवन
संस्पर्शों का अमृत पाकर
मृदा रसज अवतार हुआ
अभिलाषा के ऊंचे अंबर
चातक मन की मौन घुटन
अभिव्यक्ति के सीमित अवसर
कीलित कलुषित वातायन
किंतु घटा में चन्द्रप्रभा सी
विखराती मृदुहास कुसुम
कोमलता का संबल पाकर
निर्जन अजर विहार हुआ
महामना
No comments:
Post a Comment