Sunday, January 21, 2018

कितने प्रश्न निरूत्तर होकर झेल रहे उपहास

सर्जना

Thursday, April 9, 2009

कितने प्रश्न निरूत्तर होकर झेल रहे उपहास

नहीं दिखती है कोई आस ,नहीं दिखती है कोई प्यास

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मेल ने अनबोला साधा , अनुभव ने मींची आँख

सद्भावों के पंछी लुंठित, कटे दया के पांख

सुख उतरा है निगुणो पर, और सदगुण खडे उदास

नहीं दिखती है कोई आस ....................

चिन्तन के सर पीड़ा भारी,शौर्य के मुख पर कालिख कारी

मित्र भावः के द्वार बंद हैं , लाज निर्वसन हुई बेचारी

सत्य हुआ तप हीन और विश्वास हुआ निः श्वास

नहीं दिखती है कोई आस .......................

सारी मर्यादाएं कलंकित ,भलमनसाहत है आतंकित

मुंह देखे की कहे प्रतिष्ठा ,मानवता का मन है शंकित

विनम्रता मतलब की मारी, डग डग आलस का वास

नहीं दिखती है कोई आस ......................

गर्दूं-गाफिल at 10:30 AM

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