Friday, September 20, 2024

छोटे छोटे लोभ गिराते बड़े बड़ो कोचढ़ बैठी है दीमक लग गई सभी जड़ो को खेल भावना भूल-गए,ऐसी स्पर्धाकाट रहे हैं गले छोड़ कर गले-सड़ों को

छोटे छोटे लोभ गिराते बड़े बड़ो को
चढ़ बैठी है दीमक लग गई सभी जड़ो को 
 खेल भावना भूल-गए,ऐसी स्पर्धा
काट रहे हैं गले छोड़ कर गले-सड़ों को

Tuesday, September 17, 2024

अभी तो ये अगड़ाई है बाकी बड़ी लड़ाई हैअवसर दिया है प्रभु ने कर लें चिंतन थोड़ा पहचान करो विश्वस्तों कीदौड़े तब अश्वमेघ का घोड़ाहार हार कर जीते है कई समन्दर चोटियांपांव जरा सा फिसल गया हैहिम्मत नहीं गंवाई हैवेष पहन केसरिया बानाशरण ले लिए कई खड़कइसीलिए शायद कुछ जनताक्रोधित हो कर गई भड़कफिर भी गारंटी पर कायमसंघर्षषित हैं सिंह अनवरतजानबूझ कर झेले छल पर मानवता नहीं भुलाई हैहतप्रभ अवतारी कहते हैंअमंगलो में बड़ा रोष है अहंकार कहते विराट कोबुद्धि विलासी दृष्टि दोष हैकलंक डालना महावीर परकौन जगत कल्याण हैचन्द्रगुप्त का शौर्य रुके नदुर्गम भले चढ़ाई है

अभी तो ये अगड़ाई है बाकी बड़ी  लड़ाई हैअवसर दिया है प्रभु ने कर लें चिंतन थोड़ा पहचान करो विश्वस्तों कीदौड़े तब अश्वमेघ का घोड़ाहार हार कर जीते है कई समन्दर चोटियांपांव जरा सा फिसल गया हैहिम्मत नहीं गंवाई हैवेष पहन केसरिया बानाशरण ले लिए कई खड़कइसीलिए शायद कुछ जनताक्रोधित हो कर गई भड़कफिर भी गारंटी पर कायमसंघर्षषित हैं सिंह अनवरतजानबूझ कर झेले छल पर मानवता नहीं भुलाई हैहतप्रभ अवतारी कहते हैंअमंगलो में बड़ा रोष है अहंकार कहते विराट कोबुद्धि विलासी दृष्टि दोष हैकलंक डालना महावीर परकौन जगत कल्याण हैचन्द्रगुप्त का शौर्य रुके नदुर्गम भले  चढ़ाई है

बाबस्ता बदगुमानी में उनके सहरोशाम तब भी थे अब भी हैंइनामेनिजामत के गुलाम कुछ हुक्काम तब भी थे अब भी हैंवक्त की करवट पे भी कई नींदे न खुली , खुल ही नहीं सकींख्वाब दर ख्वाब गुलफामों के इंतजाम तब भी थे अब भी हैंएक किताब से बंधना था बंधे हैं उसी किताब को छोड़ करअपनी ज़फा पे कायम जान के अंजाम तब भी थे अब भी हैंमम

बाबस्ता बदगुमानी में उनके सहरोशाम तब भी थे अब भी हैंइनामेनिजामत के गुलाम कुछ हुक्काम तब भी थे अब भी हैंवक्त की करवट पे भी कई नींदे न खुली , खुल ही नहीं सकींख्वाब दर ख्वाब गुलफामों के इंतजाम  तब भी थे अब भी हैंएक किताब से बंधना था बंधे हैं उसी किताब को छोड़ करअपनी ज़फा पे कायम जान के अंजाम तब भी थे अब भी हैंमम

जाति व वर्ण का अंतर समझिए जाति का अर्थ होता है समान पहचान यह अलग संदर्भों के साथ अर्थ भी बदल जाता है वर्ण का अर्थ है व्यक्तित्व का अथवा स्वभाव की प्रभा भौतिक रूप में कहेगें अमुक व्यक्ति गौर अथवा कृष्ण वर्ण का है व्यक्ति का स्वभाव किस कर्म में सहज है सरल शब्दों में कहें तो मन जहां लगता है वही उसका वर्ण है ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र मूलतः वर्ण भेद हैं संताति मोह व व्यवसाय की आश्वस्ति के लिए जन्मतः जाति का प्रचलन आरंभ हुआ यह एक प्रकार का आरक्षण ही है ३ससे परिवार में पैदा होने वाले भिन्न स्वभाव के सदस्य कुंठित और आक्रामक हुए धीरे धीरे यह बैर गहरे पैठता गया किंतु समाज का बौद्धिक स्तर ऊंचा रहते तक व्यक्तित्व स्वातंत्र्य का यह आदर बना रहा । चुनावी लोकतंत्र में यह समाप्त हुआ । आरक्षण आवश्यक था और रहेगा यह मनुष्यत्व की जीविता का आधार है । वर्तमान संघर्ष आरक्षण के संवैधानिक किंतु अनैतिक लाभ उठाने के कारण पैदा हुए नवधनबलियों के समूह के सत्ता व सुविधा के अमर्यादित लोभ का उत्पाद है आशा है मेरी बात आपके हृदय तक पंहुची होगी

जाति व वर्ण का अंतर समझिए 

जाति का अर्थ होता है समान पहचान 
यह अलग संदर्भों के  साथ अर्थ भी बदल जाता है 
वर्ण का अर्थ है व्यक्तित्व का अथवा स्वभाव की प्रभा 
भौतिक रूप में कहेगें 
अमुक व्यक्ति गौर अथवा कृष्ण वर्ण का है 
व्यक्ति का स्वभाव किस कर्म में सहज है सरल शब्दों में कहें तो मन जहां लगता है  वही उसका वर्ण है 
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र मूलतः वर्ण भेद हैं 
संताति मोह व व्यवसाय की आश्वस्ति के लिए जन्मतः जाति का प्रचलन आरंभ हुआ 
यह एक प्रकार का आरक्षण ही है 
३ससे परिवार में पैदा होने वाले भिन्न स्वभाव के सदस्य कुंठित और आक्रामक हुए 
धीरे धीरे यह बैर गहरे पैठता गया 
किंतु समाज का बौद्धिक स्तर ऊंचा रहते तक व्यक्तित्व स्वातंत्र्य का यह आदर बना रहा । चुनावी लोकतंत्र में यह समाप्त हुआ । 
आरक्षण आवश्यक था और रहेगा 
यह मनुष्यत्व की जीविता का आधार है । 
वर्तमान संघर्ष आरक्षण के संवैधानिक किंतु अनैतिक लाभ उठाने के कारण पैदा हुए नवधनबलियों के समूह के सत्ता व सुविधा के अमर्यादित लोभ का उत्पाद है 
आशा है मेरी बात आपके हृदय तक पंहुची होगी

कहन अच्छी है खयाल अच्छा है तो गज़ल भी अच्छी होती है कह गए शुकुल जी रामचंद्र भाषा संस्कृति की वाहक होती हैकबूतरो के फंसाने वाले शिकारी के कबूतर की कहानी सुनी हैउसे अंदाज ही नहीं उसी के कारण उसीकी कौम गुलाम होती हैकटते रहे हैं पेड़ कुल्हाड़ी में लगे अपने ही कुल के बेट के कारणउन पेड़ो मे फूल न खिलते जिनमे जिंदगी की आग नही होती है

 कहन अच्छी है खयाल अच्छा है तो गज़ल भी अच्छी होती है 
कह गए शुकुल जी रामचंद्र भाषा संस्कृति की वाहक होती है

कबूतरो के फंसाने वाले शिकारी के कबूतर की कहानी सुनी है
उसे अंदाज ही नहीं  उसी के कारण उसीकी कौम गुलाम होती है

कटते रहे हैं पेड़ कुल्हाड़ी में लगे अपने ही कुल के बेट के कारण
उन पेड़ो मे फूल न खिलते  जिनमे जिंदगी की आग नही होती है

Thursday, April 2, 2020

करुणामय ही पीड़ाओं का हल होता है

करुणामय ही पीड़ाओं का हल होता है 
उससे क्या आशा जो केवल विष बोता है

प्रश्न बहुत है पास तुम्हारे उत्तर का क्या
नींद बहुत है शूल भरे इस बिस्तर का क्या
हिंसक जलचर बहुत नदी में गहराई भी
छुए बिना जल प्यास बुझेगी नहीं कभी भी
मिल जाएंगे समाधान अभ्यासों में बल होता है

अतिसूक्ष्म ... विषकण, जीवन पर भारी है
ठहर गई गति अब विकास पर भय तारी है
हंसने लगे फूल निरापद चिड़िया गाती
कालचक्र की इस गति पर सहसा मुस्काती
जिनका नहीं आज उनका भी क्या कल होता है

ऊब चले हैं लोग बहुत अवकाश हुआ अब
ठहरा है जल काई का  आवास हुआ अब
दुखने लगे पांव सर आंखे  बैठे बैठे 
पत्थर भी थक गया बहुत दिन ऐंठ ऐठें
तिनकों का ही ऐसे में संम्बल होता है

महामना" जगदीश गुप्त

Saturday, October 27, 2018

अनमना है गगन और धरा मौन रै

अनमना है गगन और धरा मौन है
किंचित है विचलित मन समीर का
तमतमा गया मुख सूर्य का
खुल गया है कोई स्कंध पीर का

कर २ही है निर्जला राहीओं की देह
धूम्रध्वज लिए आवेग में पवन
धूलधूसरित आकाश हो गया
हुलस मलिन  है धूप में सुमन
भोर से प्रखर हो ग्ए दिनकर
याचित हुए , गुहा और विवर
ववंडरों के डर सहमीं गुमटियां
तरस रहे हैं बादलों को मन
सुलग उठे हैं विटपों के तन
खौल गया है धीर नीर का

लय ताल छोड़कर न्यायी दिगभ्रमित
पीट रहे हैं ढोल और मृदंग
गणमान्य और प्रवर अधिमान्य विप्रवर
नाच रहे हैं उन्मत्त हो अनंग /चढ़ा भंग
क्रंद मंद हो सिसकिया हुआ
अबोध बन रहे संस्थान और स्तंभ
रूठने लगा स्वभाव मौज का
छूटने लगा साहस समाज का
टूटने लगा पिचकारियों का दम
उड़ गया है रंग मुख से अबीर का