Tuesday, September 17, 2024
बाबस्ता बदगुमानी में उनके सहरोशाम तब भी थे अब भी हैंइनामेनिजामत के गुलाम कुछ हुक्काम तब भी थे अब भी हैंवक्त की करवट पे भी कई नींदे न खुली , खुल ही नहीं सकींख्वाब दर ख्वाब गुलफामों के इंतजाम तब भी थे अब भी हैंएक किताब से बंधना था बंधे हैं उसी किताब को छोड़ करअपनी ज़फा पे कायम जान के अंजाम तब भी थे अब भी हैंमम
जाति व वर्ण का अंतर समझिए जाति का अर्थ होता है समान पहचान यह अलग संदर्भों के साथ अर्थ भी बदल जाता है वर्ण का अर्थ है व्यक्तित्व का अथवा स्वभाव की प्रभा भौतिक रूप में कहेगें अमुक व्यक्ति गौर अथवा कृष्ण वर्ण का है व्यक्ति का स्वभाव किस कर्म में सहज है सरल शब्दों में कहें तो मन जहां लगता है वही उसका वर्ण है ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र मूलतः वर्ण भेद हैं संताति मोह व व्यवसाय की आश्वस्ति के लिए जन्मतः जाति का प्रचलन आरंभ हुआ यह एक प्रकार का आरक्षण ही है ३ससे परिवार में पैदा होने वाले भिन्न स्वभाव के सदस्य कुंठित और आक्रामक हुए धीरे धीरे यह बैर गहरे पैठता गया किंतु समाज का बौद्धिक स्तर ऊंचा रहते तक व्यक्तित्व स्वातंत्र्य का यह आदर बना रहा । चुनावी लोकतंत्र में यह समाप्त हुआ । आरक्षण आवश्यक था और रहेगा यह मनुष्यत्व की जीविता का आधार है । वर्तमान संघर्ष आरक्षण के संवैधानिक किंतु अनैतिक लाभ उठाने के कारण पैदा हुए नवधनबलियों के समूह के सत्ता व सुविधा के अमर्यादित लोभ का उत्पाद है आशा है मेरी बात आपके हृदय तक पंहुची होगी
कहन अच्छी है खयाल अच्छा है तो गज़ल भी अच्छी होती है कह गए शुकुल जी रामचंद्र भाषा संस्कृति की वाहक होती हैकबूतरो के फंसाने वाले शिकारी के कबूतर की कहानी सुनी हैउसे अंदाज ही नहीं उसी के कारण उसीकी कौम गुलाम होती हैकटते रहे हैं पेड़ कुल्हाड़ी में लगे अपने ही कुल के बेट के कारणउन पेड़ो मे फूल न खिलते जिनमे जिंदगी की आग नही होती है
Thursday, April 2, 2020
करुणामय ही पीड़ाओं का हल होता है
Saturday, October 27, 2018
अनमना है गगन और धरा मौन रै
अनमना है गगन और धरा मौन है
किंचित है विचलित मन समीर का
तमतमा गया मुख सूर्य का
खुल गया है कोई स्कंध पीर का
कर २ही है निर्जला राहीओं की देह
धूम्रध्वज लिए आवेग में पवन
धूलधूसरित आकाश हो गया
हुलस मलिन है धूप में सुमन
भोर से प्रखर हो ग्ए दिनकर
याचित हुए , गुहा और विवर
ववंडरों के डर सहमीं गुमटियां
तरस रहे हैं बादलों को मन
सुलग उठे हैं विटपों के तन
खौल गया है धीर नीर का
लय ताल छोड़कर न्यायी दिगभ्रमित
पीट रहे हैं ढोल और मृदंग
गणमान्य और प्रवर अधिमान्य विप्रवर
नाच रहे हैं उन्मत्त हो अनंग /चढ़ा भंग
क्रंद मंद हो सिसकिया हुआ
अबोध बन रहे संस्थान और स्तंभ
रूठने लगा स्वभाव मौज का
छूटने लगा साहस समाज का
टूटने लगा पिचकारियों का दम
उड़ गया है रंग मुख से अबीर का
Thursday, August 9, 2018
प्रीत तुम्हारी गाते गाते
प्रीत तुम्हारी गाते गाते
गीतो का आगार हुआ
गाते गाते रूप तुम्हारा
मैं स्वतः श्रृंगार हुआ
कज्जल अपने उर लेते हैं
गहरे सरोवरो के तल
पिपासुओं के निमित्त प्रियवर
सतह सहेजें जल निर्मल
जीवन के दुर्गम पथ थे
सुविधा के जर्जर रथ थे
चंदन मन का संबल पाकर
मार्ग सहज निर्भार हुआ
कामनाओं के ववंडरों में
आंखों चुभते खंड सपन
राग मोह के लोभ दहकते
अभिमानों के ईर्ष्या वन
किंतु सौम्य शीतलता देती
सलिलातट सी सुवस पवन
संस्पर्शों का अमृत पाकर
मृदा रसज अवतार हुआ
अभिलाषा के ऊंचे अंबर
चातक मन की मौन घुटन
अभिव्यक्ति के सीमित अवसर
कीलित कलुषित वातायन
किंतु घटा में चन्द्रप्रभा सी
विखराती मृदुहास कुसुम
कोमलता का संबल पाकर
निर्जन अजर विहार हुआ
महामना
Saturday, August 4, 2018
देखता है समय सच को
देखता है समय सच को अचकचाकर
हंस रहे हैं झूठ सारे खिलखिलाकर
रातभर तरसे थे हम जिस अरूणिमा को
अरूण भी न ला सका उस लालिमा को
सिंहासनों पर आ विराजीं बदलियां
जयघोष कर गरजीं गिरीं फिर बिजलियां
डर गई सारी छतें , आवाज मिमियायी
हर स्वाभिमानी किरण लौटी तिलमिलाकर
भेड़िए निकले जिन्हें समझा गऊ था
चाटते थे वे जिसे ' अपना लहू था
आश्चर्य !( आह रे ) कैसे निरापद रह सके हम
पौ फटे आंखें फटीं थे गिद्ध हमदम
धिक इन्हें पोसा समझ कर सर्वहारा
देखता ही रह गया मन डवडबाकर
इस दौड़ में रुकना औ मरना है बराबर
दिख रहा सच ' झूठ है लेकिन सरासर
छद्म युग है धर्म संस्थापन जटिल है
युक्ति का आश्रय करें शत्रु कुटिल है
सन्निकट सत्क्रांति है धीरज न खोना
कल रोएगें ये ऊंट सारे बिलबिलाकर
जिन तेवरों से बात करनी थी उन्हें
वे अभी गिरवीं हैं सत्ता के चरण में
फस गए हैं पंरव गुड़ की ढेलियों में
३सलिए है दोगलापन आचरण में
वाह गजब के तीर हैं तरकश में उनके
छिन गई सत्ता तो लाएं हैं सजाकर