जिनकी दृष्टि समान होती है
उनकी सृष्टि महान होती है
जिनके मन सध गई समता
उनकी व्यष्टि विवान होती है
मन की जब बात नहीं बनती
भौंह तन के कमान होती है
Wednesday, June 6, 2018
जिनकी दृष्टि समान होती है
मठ पर चोरों का कब्जा है
मठ पर चोरों का कब्जा है
और ठगों की पहरेदारी
सभी देव नीलाम हो गए
ऐसी बोल रही मक्कारी
प्रामाणिकता ही अयोग्यता
कायरता ही अनुशासन है
सच कहते लकवा जिव्हा को
कालनेमि सत्ता पे भारी
लूट लिए विश्वास उन्होंने
भारी योग्य समझ कर जिनको
ऋषि संत सब सौंप गए थे
भांति - भांतिं की थाती सारी
वामन रूप धरे है रावण
नितप्रति श्री अपहृत होती है
समरसता के ढोल बजाते
जातिवाद के बड़े पुजारी
कर्णद कुंभ हुए हैं मद में
परम्पराए शील खो रही
आर्तनाद सब शोर खा गया
पसर गई चहुं दिशि लाचारी
यद्यपि शुभ है शेष अभी भी
शौर्य और भक्ति शक्ति भी
वीर प्रसूता भारत माता
पुनः बनेगी दुष्ट संहारी
तड़प रही है विकल वेदना
जाग रही है किंतु चेतना
राम विभीषण हनुमत मिललें
मिट जाएगी सब बीमारी
जब भी कोई अपने मुख पर किरणें मलता है
जब भी कोई अपने मुख पर किरणें मलता है
अंधकार छाया हो पीछे- पीछे चलता है
कितना ही गठबंधन कर ले तमस हवा के साथ
दिया- हथेली साथ रहें तो उसकी कौन बिसात
जहां कहीं भी कीचड़ कचरे रोज पनपते हैं
हम उनकी ही छाती पे पंकज से खिलते है
माना अपना मन कठोर है नहीं पिघलता है
पर बाती के संघर्षों में यह घी सा जलता है
तू अंधियारों का अनुगामी मै सहचर सूरज का
तुझको अपने पाले करना,काम बड़े धीरज का
है मनुज वही,जो असाध्य को,संभव करता है
अपने बलिदानों से जगती प्राणवान करता है
माना मन है शीत शिला सा , न ही विकलता है
किंतु लोक की शिवता को यह पलपल गलता है
सच से परदा कर लोगे तुम ऐसी आस न थी
आज खुला सच' हममें तुममें वैसी रास न थी
ऐसे शिखरों का क्या जिस पर पांव न ठहरे
वह प्रभुता क्या,जहां दंभ पाताका फहरे
अपनी कितनी भी ऊंचाई नहीं सफलता है
वही उच्च है जहां समष्टि-सेवाव्रत पलता है
हम अंधियारे के मुख पर नित सूरज मलते है
अंधकार ' छाया हो , आगे पीछे चलते हैं
सह लेंगे
सह लेंगे मंहगाई भी
सो लेंगे बिना रजाई भी
इतना वादा दो खुद को
तो कर दे सरकार चढ़ाई भी
न धेला दे , न बतलाए
गोला बारूद कहां से आए
बड़ा मुआवजा जीत चाहिए
फोकट में हर चीज चाहिए
जब बैठे गलबहिया करने
अपने सारे कष्ट बताए
महरी सेवक का शोषण करते
लाला किंचित नहीं लजाए
ऐसे ऐसो को ऐशों का
सारा साजो साज चाहिए
नहीं कभी कोईं राह बनाई
लक्ष्य रोज एवरेस्ट चाहिए
मरने को सेना से कह दो
खुद को घर भरपूर चाहिए
चीन्ह चीन्ह कर रेवड़ बाटें
जग को समरस गीत चाहिए
रिश्तेदार मलाई मारें
जाति वाले ओहदे पालें
ऐसे झूठे मक्कारों को
जनता के प्रणाम चाहिए
महामना
Saturday, January 27, 2018
आभार
आभार हर शुभ ऐष्णा का
आभार हर शुभभावना का
आभार हर शुभ कामना का
आभार हर आराधना का
संच में जो हैं सुसज्जित
आभार उनकी साधना का
मंच पर जो हैं विराजित
आभार उनकी प्रेरणा का
राष्ट्रहित क्षण क्षण समर्पण
भारती की आरती में प्राण अर्पण
हवि हुए गा गीत वंदेमातरम् का
आभार हर शुभकामना का
प्रत्यक्ष में हैं चार दिन से साथ
पर है अनवरत माथे पें उनका हाथ
लक्ष्य तक लाए संकल्प रथ को खींच
आभार श्रम स्वेद की आराधना का
आभार सबकी प्रेरणा का
आभार सबकी साधना का
आभार हर शुभ कामना का
आभार हर आराधना का
धन्यवाद
हमारे प्रिय बाबा योगेन्द्र
अब पद्यश्री विभूषित
हमारे प्रिय बाबा योगेन्द्र
मनुज हित में कला होजाए
यह पुरुषार्थ कर डाला
राष्ट्रहित हो कला साधन
जगत में भाव भर डाला
सभी के ह्रदयप्रिय महेन्द्र
हमारे प्रिय बाबा योगेन्द्र
दधीचि सम संकल्पित साध
भीष्म सम दृढता अनत अगाध
संघ साधना है सर्वोपरि
स्वयं से सिद्ध कर डाला
लोकमें करुणामय सत्येन्द्र
हमारे प्रिय बाबा योगेन्द्र
अहा यह उज्जवल देवमूर्ति
हृदयों में बसी प्रेम सत्कीर्ति
मातृवत सबको दुलराने
स्वयं को होम कर डाला
अनुष्ठानों के प्रज्ञा केन्द्र
हमारे प्रिय बाबा योगेन्द्र
अपरिग्रह जहां विनीत हुआ
प्रवास ही जीवन गीत दुआ
मधुरतम शब्दों का आगार
कला पाती जिनसे श्रृंगार
कलाधर निश्छल स्वयं मृगेन्द्र
सर्वप्रिय बाबा श्री योगेन्द्र
पद्म श्री जिनसे आभा पाए
सरलता जिनको छू के आए
विनय होजाए विनत जहां
दृष्टि समरसता पाए यहां
जलज पंकज से ये पुष्पेन्द्र
हमारे प्रिय बाबा योगेन्द्र
जगदीश 'महामना"
Sunday, January 21, 2018
सरस्वती वंदना
Sunday, January 17, 2010
वसंत पंचमी की शुभ कामनाए
सरस्वती वंदना

भावनाओं में ,कामनाओं में ,शौर्य सुधा भर दे
वीणा वादिनी ,मातु शारदे ,,राष्ट्र भक्ति वर दे
नीति सन्मति ,सत्य संस्कृति ,सम-आदर ,विश्वास
समता-समरसता के पथ पर दृढ़ प्रतिज्ञ अनुप्रास
अजर-दिव्यता ,अतुल-भव्यता ,,'पूर्ण प्रतिष्ठा दे
सहयोगी सह-भागी भारत , संकुल निष्ठां दे
विज्ञ -तग्यता ,ओज, सभ्यता ,विनत विश्व आकाश
अंतर भारत के जीवन में ,प्रबल -प्रेम,नित्-हास
गुडानुरागी, व्यसन-विरागी तरुण ,सुविद्या दे
धर्मं-अधिष्ठित अखंड भारत ,योगी प्रज्ञा दे
समुचित वृष्टी ,नियमित ऋतुयें , धान, मान ,दिनमान
गौरव पूरित सदय ह्रदय में ,शक्ति-मान अभियान
आत्मा-चेतना , विश्व-योजना , श्रम-तत्परता दे
दुर्जन-हन्ता, सज्जन भारत ,, सत -उर्वरता दे
10 comments:
योगेश स्वप्नJanuary 17, 2010 at 4:37 PM
समुचित वृष्टी ,नियमित ऋतुयें , धान, मान ,दिनमान
गौरव पूरित सदय ह्रदय में ,शक्ति-मान अभियान
आत्मा-चेतना , विश्व-योजना , श्रम-तत्परता दे
दुर्जन-हन्ता, सज्जन भारत ,, सत -उर्वरता दे ,
bahut khoobsurat panktian, ati sunder rachna. badhaai............. aameen.

सर्वत एम०January 17, 2010 at 9:26 PM
नीति सन्मति ,सत्य संस्कृति ,सम-आदर ,विश्वास
समता-समरसता के पथ पर दृढ़ प्रतिज्ञ अनुप्रास
अजर-दिव्यता ,अतुल-भव्यता ,,'पूर्ण प्रतिष्ठा दे
सहयोगी सह-भागी भारत , संकुल निष्ठां दे
अवाक कर दिया भाई. माँ सरस्वती से प्रार्थना में जो-जो वर मांगे, जिस अंदाज़ में मांगे, जिस भाषा-व्याकरण, सौष्ठव में मांगे, उसने मुग्ध कर दिया. आप की लेखनी उत्तरोत्तर कविता के शिखरों को न केवल छू रही है, बल्कि उन पर विराजमान होती जा रही है. मन करता है, आपकी लेखनी की प्रशस्ति में एक गीत लिख डालूँ. लेकिन डर लगता है, बाकी ब्लागर बन्धु नाराज़ हो जाएँगे. इस लिए थोड़े लिखे को बहुत समझना और लौटती डाक से जवाबभेजना.
अंत में, माँ सरस्वती की असीम अनुकम्पा है आप पर.
वन्दना अवस्थी दुबेJanuary 18, 2010 at 4:03 AM
बसन्तपंचमी के पहले ही कितना सुन्दर गीत मिल गया. बधाई.
अल्पना वर्माJanuary 19, 2010 at 1:02 AM
बसंत पंचमी की शुभकामनाएँ.
बहुत ही सुंदर कविता है क्या कहें...
हिन्दी के इतने सुंदर शब्दो का प्रयोग किया है.
बहुत ही बहुत अच्छी रचना!
बधाई!

psinghJanuary 22, 2010 at 3:00 AM
wah bahut khub
bahut bahut abhar
shamaFebruary 1, 2010 at 6:39 AM
Yahi dua apne liyebhi karungi..ki, ma Sharda sada desh bhaktee ka jazba manme banaye rakhe!

kshamaFebruary 1, 2010 at 6:43 AM
भावनाओं में ,कामनाओं में ,शौर्य सुधा भर दे
वीणा वादिनी ,मातु शारदे ,,राष्ट्र भक्ति वर दे
Chahun to yahi chahun!

kshamaApril 24, 2010 at 10:44 AM
विज्ञ -तग्यता ,ओज, सभ्यता ,विनत विश्व आकाश
अंतर भारत के जीवन में ,प्रबल -प्रेम,नित्-हास
गुडानुरागी, व्यसन-विरागी तरुण ,सुविद्या दे
धर्मं-अधिष्ठित अखंड भारत ,योगी प्रज्ञा दे
Aaj phir ekbaar padhi yah rachana...ek shabd idhar udhar nahi...ek bahti sarita-sa pravah..gazabka fan hasil hai aapko!

vibha rani ShrivastavaJanuary 30, 2014 at 5:31 AM
मंगलवार 04/02/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगाhttp://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
आप भी एक नज़र देखें
धन्यवाद .... आभार ....

Kaushal LalFebruary 3, 2014 at 7:57 PM
जय माँ सरस्वती....शुभ कामनाए
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