Friday, September 20, 2024

उनके आगे बौने है पूरी तरह से छौने है हाँ उनसे भी दुबले है लेकिन वे तो पुतले हैंमम

 उनके आगे बौने है पूरी तरह से छौने है हाँ उनसे भी दुबले है लेकिन वे तो पुतले हैंमम


करो प्रकाशित दुखिया के सुख
सुखिया के उजियारे कर दो 
दीप कहे जय मेरी होगी
जितने चाहों अंधियारे भर दो

13nov 23 fb

छोटे छोटे लोभ गिराते बड़े बड़ो को
चढ़ बैठी है दीमक लग गई सभी जड़ो को 
 खेल भावना भूल-गए,ऐसी स्पर्धा
काट रहे हैं गले छोड़ कर गले-सड़ों को

18nov 23

तिलक लगा चोरी करी चोटी रख व्यभिचार
उसे न हिंदू जानिए वह धर्म विघातक स्यार

मम24nov 23 
संवाद पर होने लगे जब जब वाद विवाद
मौन सहेजो कृष्ण की गीता कर लो याद

-मम5nov 23

पत्थर पर खिला फूल हूँ 
हर अनय के लिए शूल हूँ
प्रतिभद्र हूँ अभद्र के लिए
धर्म के लिए ही अनुकूल हूँ

बॉह के नाग प्रकरण नहीं
अलंकर हैं शुभंकर हैं
हिंसक से भी हिंसा नहीं
यहां कंकर भी शंकर है
मेरा शौर्य है प्रतिरोधी
शूल के लिए मैं त्रिशूल हूँ
 
-मम
 
-मम

सिद्ध होए के पूर्व की दशा प्रसिद्ध कहाए
सिद्ध प्रसिद्ध का भेद जो जाने विद्य कहाए 
काग काग है काग से का तौले काकभुशुण्डि
जो जान गया है राम को तृप्ति सद्गति पाए

मम 19 Dec 2023
जहां न करना हो कुछ खर्चा
उस टॉपिक पर कर लो चर्चा

जहाँ पे होता हो जी खट्टा
जहाँ पे लगता हो कुछ बट्टा
जिस में होना हो कुछ रट्टा
वहां पे चुप्पी लुक्का छुप्पी
सुन कर सच खाजाते मिर्चा

राजनीति के घोर निदेशक
खेलो के महा-तज्ञ विशेषक
बढ़चढ कर करते संवाद
मुफ्त सलाह ढेरो बकवाद
बिना प्रार्थना पढ़ते पर्चा

मम 17 Dec 2023

दर्द बिना निर्माण न होता
पूछो अपनी माता से 
कितना दर्द सहा उसने
जन कर तुम्हें बढ़ाने में 
पी कर उसका खून ,आज 
शर्म नहीं गुर्राने में

कभी गिने क्या ?
कितने कत्ल हुए ,
लहराने अपने 
विश्वासों का परचम
विश्वासों की आड लूटा
कितनी श्रद्धाओं का आंगन
टूट गई जब जब तलवारें
 कितने छल छंदो को बोया
छलनी छलनी हुई मनुजता
जार जार आकाश भी रोया 
फिर भी बेशर्मी है लादी
खून को रंग बताने में

आक्रामक की और रक्षक की 
हिंसा में समता बतलाते
अब भी रंगे सियार बोटियां
लेकर आड मजहब की खाते
बडी बडी बातों में उलझा
सरल मनों को फांस रहे हैं
हूरों के सपने दिखला कर
टिकट मौत के बांट रहे है
 मजहब के धंधे में माहिर
सच को झूठ बनाने में

मम 16 Dec 2023

अपना अध्यवसाय जोड़नाउनका है व्यवसाय तोड़नातोड़फोड़ में मगन खूब वेहमको भी क्यों राह छोड़ना ?उनकी करनी भिन्न कथन सेबे-परवाह उत्थान पतन से वेदनाओं पर पाक बनातेछौंक घृणा का खूब लगातेवे विखेरते फूट के काँटेहमको तो है सब समेटनाउनका वातावरण कोड़नावे नित देते घाव जगत कोहम औषधि आलेपन तत्परदिखने में तो समान ही है हैं विलोम वृत्ति में परस्परवे विष का आरोपण करतेहमें हलाहल है निर्मूलनासारे ही विषदंत फोड़नाछ्ल छन्दों के उनके शोरअपनी प्रार्थनाओं से भोरउनकी अमा निशा से प्रीत दिनकर है अपना मनमीतउनको प्रिय है बैर बढ़ानाहम को भाता प्रेम सींचनाचाहें मन उनके भी मोड़नामम

अपना अध्यवसाय जोड़ना
उनका है व्यवसाय तोड़ना
तोड़फोड़ में मगन खूब वे
हमको भी क्यों राह छोड़ना ?

उनकी करनी भिन्न कथन से
बे-परवाह उत्थान पतन से 
वेदनाओं पर पाक बनाते
छौंक घृणा का खूब लगाते
वे विखेरते फूट के काँटे
हमको तो है सब समेटना
उनका वातावरण कोड़ना

वे नित देते  घाव जगत को
हम औषधि आलेपन तत्पर
दिखने में तो समान ही है 
हैं विलोम वृत्ति में परस्पर
वे विष का आरोपण करते
हमें हलाहल है निर्मूलना
सारे ही विषदंत फोड़ना

छ्ल छन्दों के उनके शोर
अपनी प्रार्थनाओं से भोर
उनकी अमा निशा से प्रीत 
दिनकर है अपना मनमीत
उनको प्रिय है बैर बढ़ाना
हम को भाता प्रेम सींचना
चाहें मन उनके भी मोड़ना

मम
12nov 2023 fb 

अपना अध्यवसाय जोड़ना
उनका है व्यवसाय तोड़ना
तोड़फोड़ में मगन खूब वे
हमको भी क्यों राह छोड़ना ?

उनकी करनी भिन्न कथन से
बे-परवाह उत्थान पतन से 
वेदनाओं पर पाक बनाते
छौंक घृणा का खूब लगाते
वे विखेरते फूट के काँटे
हमको तो है सब समेटना
उनका वातावरण कोड़ना

वे नित देते घाव जगत को
हम औषधि आलेपन तत्पर
दिखने में तो समान ही है 
हैं विलोम वृत्ति में परस्पर
वे विष का आरोपण करते
हमें हलाहल है निर्मूलना
सारे ही विषदंत फोड़ना

छ्ल छन्दों के उनके शोर
अपनी प्रार्थनाओं से भोर
उनकी अमा निशा से प्रीत 
दिनकर है अपना मनमीत
उनको प्रिय है बैर बढ़ाना
हम को भाता प्रेम सींचना
चाहें मन उनके भी मोड़ना

मम

छोटे छोटे लोभ गिराते बड़े बड़ो कोचढ़ बैठी है दीमक लग गई सभी जड़ो को खेल भावना भूल-गए,ऐसी स्पर्धाकाट रहे हैं गले छोड़ कर गले-सड़ों को

छोटे छोटे लोभ गिराते बड़े बड़ो को
चढ़ बैठी है दीमक लग गई सभी जड़ो को 
 खेल भावना भूल-गए,ऐसी स्पर्धा
काट रहे हैं गले छोड़ कर गले-सड़ों को

Tuesday, September 17, 2024

अभी तो ये अगड़ाई है बाकी बड़ी लड़ाई हैअवसर दिया है प्रभु ने कर लें चिंतन थोड़ा पहचान करो विश्वस्तों कीदौड़े तब अश्वमेघ का घोड़ाहार हार कर जीते है कई समन्दर चोटियांपांव जरा सा फिसल गया हैहिम्मत नहीं गंवाई हैवेष पहन केसरिया बानाशरण ले लिए कई खड़कइसीलिए शायद कुछ जनताक्रोधित हो कर गई भड़कफिर भी गारंटी पर कायमसंघर्षषित हैं सिंह अनवरतजानबूझ कर झेले छल पर मानवता नहीं भुलाई हैहतप्रभ अवतारी कहते हैंअमंगलो में बड़ा रोष है अहंकार कहते विराट कोबुद्धि विलासी दृष्टि दोष हैकलंक डालना महावीर परकौन जगत कल्याण हैचन्द्रगुप्त का शौर्य रुके नदुर्गम भले चढ़ाई है

अभी तो ये अगड़ाई है बाकी बड़ी  लड़ाई हैअवसर दिया है प्रभु ने कर लें चिंतन थोड़ा पहचान करो विश्वस्तों कीदौड़े तब अश्वमेघ का घोड़ाहार हार कर जीते है कई समन्दर चोटियांपांव जरा सा फिसल गया हैहिम्मत नहीं गंवाई हैवेष पहन केसरिया बानाशरण ले लिए कई खड़कइसीलिए शायद कुछ जनताक्रोधित हो कर गई भड़कफिर भी गारंटी पर कायमसंघर्षषित हैं सिंह अनवरतजानबूझ कर झेले छल पर मानवता नहीं भुलाई हैहतप्रभ अवतारी कहते हैंअमंगलो में बड़ा रोष है अहंकार कहते विराट कोबुद्धि विलासी दृष्टि दोष हैकलंक डालना महावीर परकौन जगत कल्याण हैचन्द्रगुप्त का शौर्य रुके नदुर्गम भले  चढ़ाई है

बाबस्ता बदगुमानी में उनके सहरोशाम तब भी थे अब भी हैंइनामेनिजामत के गुलाम कुछ हुक्काम तब भी थे अब भी हैंवक्त की करवट पे भी कई नींदे न खुली , खुल ही नहीं सकींख्वाब दर ख्वाब गुलफामों के इंतजाम तब भी थे अब भी हैंएक किताब से बंधना था बंधे हैं उसी किताब को छोड़ करअपनी ज़फा पे कायम जान के अंजाम तब भी थे अब भी हैंमम

बाबस्ता बदगुमानी में उनके सहरोशाम तब भी थे अब भी हैंइनामेनिजामत के गुलाम कुछ हुक्काम तब भी थे अब भी हैंवक्त की करवट पे भी कई नींदे न खुली , खुल ही नहीं सकींख्वाब दर ख्वाब गुलफामों के इंतजाम  तब भी थे अब भी हैंएक किताब से बंधना था बंधे हैं उसी किताब को छोड़ करअपनी ज़फा पे कायम जान के अंजाम तब भी थे अब भी हैंमम

जाति व वर्ण का अंतर समझिए जाति का अर्थ होता है समान पहचान यह अलग संदर्भों के साथ अर्थ भी बदल जाता है वर्ण का अर्थ है व्यक्तित्व का अथवा स्वभाव की प्रभा भौतिक रूप में कहेगें अमुक व्यक्ति गौर अथवा कृष्ण वर्ण का है व्यक्ति का स्वभाव किस कर्म में सहज है सरल शब्दों में कहें तो मन जहां लगता है वही उसका वर्ण है ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र मूलतः वर्ण भेद हैं संताति मोह व व्यवसाय की आश्वस्ति के लिए जन्मतः जाति का प्रचलन आरंभ हुआ यह एक प्रकार का आरक्षण ही है ३ससे परिवार में पैदा होने वाले भिन्न स्वभाव के सदस्य कुंठित और आक्रामक हुए धीरे धीरे यह बैर गहरे पैठता गया किंतु समाज का बौद्धिक स्तर ऊंचा रहते तक व्यक्तित्व स्वातंत्र्य का यह आदर बना रहा । चुनावी लोकतंत्र में यह समाप्त हुआ । आरक्षण आवश्यक था और रहेगा यह मनुष्यत्व की जीविता का आधार है । वर्तमान संघर्ष आरक्षण के संवैधानिक किंतु अनैतिक लाभ उठाने के कारण पैदा हुए नवधनबलियों के समूह के सत्ता व सुविधा के अमर्यादित लोभ का उत्पाद है आशा है मेरी बात आपके हृदय तक पंहुची होगी

जाति व वर्ण का अंतर समझिए 

जाति का अर्थ होता है समान पहचान 
यह अलग संदर्भों के  साथ अर्थ भी बदल जाता है 
वर्ण का अर्थ है व्यक्तित्व का अथवा स्वभाव की प्रभा 
भौतिक रूप में कहेगें 
अमुक व्यक्ति गौर अथवा कृष्ण वर्ण का है 
व्यक्ति का स्वभाव किस कर्म में सहज है सरल शब्दों में कहें तो मन जहां लगता है  वही उसका वर्ण है 
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र मूलतः वर्ण भेद हैं 
संताति मोह व व्यवसाय की आश्वस्ति के लिए जन्मतः जाति का प्रचलन आरंभ हुआ 
यह एक प्रकार का आरक्षण ही है 
३ससे परिवार में पैदा होने वाले भिन्न स्वभाव के सदस्य कुंठित और आक्रामक हुए 
धीरे धीरे यह बैर गहरे पैठता गया 
किंतु समाज का बौद्धिक स्तर ऊंचा रहते तक व्यक्तित्व स्वातंत्र्य का यह आदर बना रहा । चुनावी लोकतंत्र में यह समाप्त हुआ । 
आरक्षण आवश्यक था और रहेगा 
यह मनुष्यत्व की जीविता का आधार है । 
वर्तमान संघर्ष आरक्षण के संवैधानिक किंतु अनैतिक लाभ उठाने के कारण पैदा हुए नवधनबलियों के समूह के सत्ता व सुविधा के अमर्यादित लोभ का उत्पाद है 
आशा है मेरी बात आपके हृदय तक पंहुची होगी

कहन अच्छी है खयाल अच्छा है तो गज़ल भी अच्छी होती है कह गए शुकुल जी रामचंद्र भाषा संस्कृति की वाहक होती हैकबूतरो के फंसाने वाले शिकारी के कबूतर की कहानी सुनी हैउसे अंदाज ही नहीं उसी के कारण उसीकी कौम गुलाम होती हैकटते रहे हैं पेड़ कुल्हाड़ी में लगे अपने ही कुल के बेट के कारणउन पेड़ो मे फूल न खिलते जिनमे जिंदगी की आग नही होती है

 कहन अच्छी है खयाल अच्छा है तो गज़ल भी अच्छी होती है 
कह गए शुकुल जी रामचंद्र भाषा संस्कृति की वाहक होती है

कबूतरो के फंसाने वाले शिकारी के कबूतर की कहानी सुनी है
उसे अंदाज ही नहीं  उसी के कारण उसीकी कौम गुलाम होती है

कटते रहे हैं पेड़ कुल्हाड़ी में लगे अपने ही कुल के बेट के कारण
उन पेड़ो मे फूल न खिलते  जिनमे जिंदगी की आग नही होती है