Sunday, September 6, 2026

1चांद का रहता चित्त अधीर उभरती है 2 तुम हो हम हैं और हमारे साथ हमारी पीड़ाएं आओ सुख की करें प्रतीक्षा तब तक इनको ही गाएंअ

[17/04, 16:40] mahamna: चांद का रहता चित्त अधीर 
उभरती है रातों में पीर 
दृगबिंदु में दुख का सागर 
धरूं मैं कैसे धीर 
उभरती है रातों में पीर

देख नदी की विकल निबलता बादल जल भर लाए 
तटबंधों के अतिक्रम तोड़े किंतु लक्ष्य न पाए 
बहुत गंद तो बहा ले गई फिर भी रही विफल 
जिन नदियों को मां कहते हैं उघड़े उनके चीर 

देख रहा हूं लुटी मनुजता दानवदल का शोर
श्रम सीकर के मानहरण निर्लज्जित हठ घनघोर 
ऊपर ऊपर यश गाथाएं 'तल में अपयश कीच  
केतु बांट रहे परसादी वंचित देवों से खीर

अनय के आगे खड़े विनयवत छत्रप शूद्र सवर्ण  
दुर्योधन के रक्षक बनकर खड़े हुए हैं कर्ण
 मंत्रों की विकृत आवृतियां आएं कैसे देव
कैसे जीते सत्य सनातन रण चूक रहे अब वीर
[17/04, 16:40] mahamna: तुम हो हम हैं और हमारे साथ हमारी पीड़ाएं
 आओ सुख की करें प्रतीक्षा तब तक इनको ही गाएं

अभी खौल है अपने भीतर 
पकने पर रस आएगा
 गर्मी वर्षा शिशिर सहेंगे 
तब बसंत मुस्काएगा 
साथ-साथ हैं यही बहुत है 
पल-पल को मधुमास बनाएं 

तुम हो हम हैं और हमारे साथ हमारी पीड़ाएं 
आओ सुख की करें प्रतीक्षा 
तब तक इनको ही गाएं 

चांद को देखो पूनम की 
हर मास प्रतीक्षा करता है 
पूरा खिलाने से पहले 
हर एक अमावस मरता है 
न रात रहे न ग्रहण रहे 
उत्सव प्रिय नित्य मनाएं 

तुम हो हम हैं और हमारे साथ हमारे पीड़ाएं
आओ सुख की करें प्रतीक्षा 
तब तक इनको ही गाएं 

जिनसे सूरज भी हुआ पराजित
उन कोनों का ध्यान करो 
पीर पराई पीने को
कुछ अपने हित बलिदान करो
तुम स्नेह बनो, मैं बनूं वर्तिका
तम से इनको मुक्ति दिलाएं