Sunday, January 21, 2018

हो गया छवि देखकर मैं मुग्ध जिसकी

Sunday, July 5, 2015


एक वर्षों पुराने खुदरा कागज से सहेज ली आज एक अनगढ़ रचना

हो गया छवि देखकर मैं मुग्ध जिसकी
आ रहा आभार है उस मूर्तिका पर
मन मालिनी मकरंद रज की भूमिका में
छा गई है मन भुवन की बुर्जिका पर

ग्यात से अग्यात के पथ पांव अनुचर
धूप से सुख छांव तक के नित्य सहचर
अभिमाननी आंख में उतरा प्रणयपल
माधुर्य आया तब भंवरती गीतिका पर

आह्लाद के आभार में श्रृगांर कर आई
मधुरिमा प्रतिदान का संकेत कर आई
प्रतिदृष्टि में कौंधी धजा विद्युल्लता सी
लावण्य भर आया सहमती रीतिका पर

[12:25AM, 05/04/2015] jgdis Gupt:

कांच कंचन हुआ मन वृंदावन हुआ

सर्जना

Monday, July 6, 2015

आज नगर के सिद्ध और  समर्थ गीतकारों के बीच यह गीत पढ़ने का संयोग बना | सौभाग्य से सबने सराहा|
एक मांग भी आई कि इसमें वृद्धि की जाए | यह प्रयास किया है |हमारे मंच के विशेषग्यों से मुक्त सुझावों  की अपेक्छा है  |
जो स्वयं को विशेषग्य नहीं मानते वे भावपक्छ पर सुधार और उसके प्रभाव सुझाएं |  स्मरण रहे आज जो प्रशंशा हुई उसका श्रेय वस्तुतः इस मंच के विशेषग्यों को जाता है क्यों कि यहां से पास होने के कारण ही मैने आज रचना
पाठ किया |
सामान्यतः मेरी रुचि सुनने में ही अधिक है|

कांच कंचन हुआ मन वृंदावन हुआ

कांच कंचन हुआ मन वृंदावन हुआ
 पांव पायल हुई बावरी बावरी
गंधरस मेँ पगी रुप की माधुरी
भोर होते हुई पांखुरी पांखुरी

स्वर सुधा साध कर रागिनी सुरमई
द्रुत विलंबित हुई मध्यमा छुईमुई
दृश्यमय हो गए गीत गोविंद के
तार सप्तक अधर हो गए बांसुरी

सर से सरकी चुनर,धूप निखरी इधर
 भोर का छोर तज मुख हुआ दोपहर
रश्मिरथ पे चढ़ा सूर्य आगे बढ़ा
सांझ की लालिमा हो गई सांवरी

रच गई अल्पना सच हुई कल्पना
व्योम पर छा गया एक बादल घना
तूलिका हंस पड़ी रंग नर्तक हुए
 लय हुई देह की  भांवरी भांवरी

[11:48PM, 05/04/2015] jgdis Gupt

कितने प्रश्न निरूत्तर होकर झेल रहे उपहास

सर्जना

Thursday, April 9, 2009

कितने प्रश्न निरूत्तर होकर झेल रहे उपहास

नहीं दिखती है कोई आस ,नहीं दिखती है कोई प्यास

...............................................

मेल ने अनबोला साधा , अनुभव ने मींची आँख

सद्भावों के पंछी लुंठित, कटे दया के पांख

सुख उतरा है निगुणो पर, और सदगुण खडे उदास

नहीं दिखती है कोई आस ....................

चिन्तन के सर पीड़ा भारी,शौर्य के मुख पर कालिख कारी

मित्र भावः के द्वार बंद हैं , लाज निर्वसन हुई बेचारी

सत्य हुआ तप हीन और विश्वास हुआ निः श्वास

नहीं दिखती है कोई आस .......................

सारी मर्यादाएं कलंकित ,भलमनसाहत है आतंकित

मुंह देखे की कहे प्रतिष्ठा ,मानवता का मन है शंकित

विनम्रता मतलब की मारी, डग डग आलस का वास

नहीं दिखती है कोई आस ......................

गर्दूं-गाफिल at 10:30 AM

चांदनी से भरे मुट्ठियां

सर्जना

Sunday, April 19, 2009

चाँदनी से भरे मुट्ठियाँ
लीपती मैं रही चिट्ठियां

आंचल में बिखरे हुए
पलको में उलझे हुए
सपनों को सिलती रही
बरसती रहीं बदलियाँ

मधुबन कई बुन लिए
टांके कई इन्द्रधनु
ममता को तुर्पते हुए
घायल हुई उँगलियाँ 

सितारों को जड़ते हुए
वसंतों को मढ़ते हुए 
जरीदारधागों में लिपटीं 
उलझतीं रहीं गुत्थियाँ

गर्दूं-गाफिल at 11:37 AM

तो मानें तुम्हें

पाप के गीत गाकर कमाते हो तुम
पुण्य के गीत गाओ तो जानें तुम्हें
जो समाचार है नित्य अखबार में
इससे हट कुछ बताओ तो मानें तुम्हें

जो सुनाओगे तुम,बो के जाओगे तुम
कल बढ़ेगा वही ,फिर फलेगा वही
भ्रष्ट हैं हम सभी, धृष्ट हैं हम सभी
हमको सज्जन बनाओ तो मानें तुम्हें

कौन सी दृष्टि लेकर डगर में हो तुम
देख पाते नहीं कुछ सिवा पाप के
ढूढ़ते फिर रहे सिर्फ बीमारियां
कुछ दवाऐं बताओ तो मानें तुम्हें

चन्द्र हर्षित नृत्यरत ' चन्द्र की आभा चहूं

चन्द्र हर्षित नृत्यरत ' चन्द्र की आभा चहूं
इस निविड़ एकान्त में ,कैसे अकेला मैं रहूं

प्रिय पार हो तुम व्योम के ' मैं अधूरा धूम्रवत
विरहवेदी पर स्मृति में, मैं स्वयं आहुतिवत
कालिमा से लालिमा तक ,है क्या प्रतिक्षा के सिवा
आत्मरति के विप्लावों को भोर तक कैसे सहूं

सो रहा है जगत आधा प्रियस्थिति के अंक में
भाग्यशाली भ्रमर विलसित सहकमलिनी पंक में
इस निशा में भी कलुष कूटों की काली छांव है
क्रोध में करूणा है मेरी ,है मन विकल किससे कहूं

महामना ग़रदूं

Friday, May 19, 2017

अल्पनाओं में कल्पनाओं के रंग लगे झरने 

अल्पनाओं में कल्पनाओं के रंग लगे झरने 
संदल स्वप्निल दृश्य दिवस निशि हृदय लगे भरने 

सुख सरिता के स्रोत सुगम ,उन्मीलित माणिक दृग 
रोम रोम आह्लाद मुदित ,कंचन कस्तूरी मृग 
नवल धवल स्नेहमयी काया पुलकित पुलकित 
रिक्त व्योम में आकुल आतुर मेघ लगे घिरने 

नन्दित वन मयूर सम क्रम पर उन्मादित पथ संच 
सहज विराजित स्वयंश्री का गर्वित शोभित मंच 
तरुणाई पर अरुणाई का लाश्य लाश्य नर्तन 
अभिलाषित चातक अभिनंदित ,रूप सुधा वरने 

सहज दर्पिता रूप गर्विता कीलय वाक विलास 
मद्द मधु ऋतु ,सौम्य संहिता ,सत्कारी शुभ  हास 
सुभ्र दन्तिका चित्र पदमिनी ,धीर धरा गंभीर 
उद्धेलित कर्षण ,आकांक्षित ,विंध्य भर धरने 

चंद्रमुखी के अधर मध्य में पल्ल्व पंकज देश 
कौतुक कटि हठ ,धनिक कम्बु घट,विन्यासित पट केश 
उन्नत हिमगिरि ,मध्य शिवा सा अद्भुत अभाकाश 
चकित काम , संधान त्याग तज , जुटा  भक्ति करने 

जगदीश महामना "गर्दू ग़ाफ़िल "