Sunday, January 21, 2018

कितने प्रश्न निरूत्तर होकर झेल रहे उपहास

सर्जना

Thursday, April 9, 2009

कितने प्रश्न निरूत्तर होकर झेल रहे उपहास

नहीं दिखती है कोई आस ,नहीं दिखती है कोई प्यास

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मेल ने अनबोला साधा , अनुभव ने मींची आँख

सद्भावों के पंछी लुंठित, कटे दया के पांख

सुख उतरा है निगुणो पर, और सदगुण खडे उदास

नहीं दिखती है कोई आस ....................

चिन्तन के सर पीड़ा भारी,शौर्य के मुख पर कालिख कारी

मित्र भावः के द्वार बंद हैं , लाज निर्वसन हुई बेचारी

सत्य हुआ तप हीन और विश्वास हुआ निः श्वास

नहीं दिखती है कोई आस .......................

सारी मर्यादाएं कलंकित ,भलमनसाहत है आतंकित

मुंह देखे की कहे प्रतिष्ठा ,मानवता का मन है शंकित

विनम्रता मतलब की मारी, डग डग आलस का वास

नहीं दिखती है कोई आस ......................

गर्दूं-गाफिल at 10:30 AM

चांदनी से भरे मुट्ठियां

सर्जना

Sunday, April 19, 2009

चाँदनी से भरे मुट्ठियाँ
लीपती मैं रही चिट्ठियां

आंचल में बिखरे हुए
पलको में उलझे हुए
सपनों को सिलती रही
बरसती रहीं बदलियाँ

मधुबन कई बुन लिए
टांके कई इन्द्रधनु
ममता को तुर्पते हुए
घायल हुई उँगलियाँ 

सितारों को जड़ते हुए
वसंतों को मढ़ते हुए 
जरीदारधागों में लिपटीं 
उलझतीं रहीं गुत्थियाँ

गर्दूं-गाफिल at 11:37 AM

तो मानें तुम्हें

पाप के गीत गाकर कमाते हो तुम
पुण्य के गीत गाओ तो जानें तुम्हें
जो समाचार है नित्य अखबार में
इससे हट कुछ बताओ तो मानें तुम्हें

जो सुनाओगे तुम,बो के जाओगे तुम
कल बढ़ेगा वही ,फिर फलेगा वही
भ्रष्ट हैं हम सभी, धृष्ट हैं हम सभी
हमको सज्जन बनाओ तो मानें तुम्हें

कौन सी दृष्टि लेकर डगर में हो तुम
देख पाते नहीं कुछ सिवा पाप के
ढूढ़ते फिर रहे सिर्फ बीमारियां
कुछ दवाऐं बताओ तो मानें तुम्हें

चन्द्र हर्षित नृत्यरत ' चन्द्र की आभा चहूं

चन्द्र हर्षित नृत्यरत ' चन्द्र की आभा चहूं
इस निविड़ एकान्त में ,कैसे अकेला मैं रहूं

प्रिय पार हो तुम व्योम के ' मैं अधूरा धूम्रवत
विरहवेदी पर स्मृति में, मैं स्वयं आहुतिवत
कालिमा से लालिमा तक ,है क्या प्रतिक्षा के सिवा
आत्मरति के विप्लावों को भोर तक कैसे सहूं

सो रहा है जगत आधा प्रियस्थिति के अंक में
भाग्यशाली भ्रमर विलसित सहकमलिनी पंक में
इस निशा में भी कलुष कूटों की काली छांव है
क्रोध में करूणा है मेरी ,है मन विकल किससे कहूं

महामना ग़रदूं

Friday, May 19, 2017

अल्पनाओं में कल्पनाओं के रंग लगे झरने 

अल्पनाओं में कल्पनाओं के रंग लगे झरने 
संदल स्वप्निल दृश्य दिवस निशि हृदय लगे भरने 

सुख सरिता के स्रोत सुगम ,उन्मीलित माणिक दृग 
रोम रोम आह्लाद मुदित ,कंचन कस्तूरी मृग 
नवल धवल स्नेहमयी काया पुलकित पुलकित 
रिक्त व्योम में आकुल आतुर मेघ लगे घिरने 

नन्दित वन मयूर सम क्रम पर उन्मादित पथ संच 
सहज विराजित स्वयंश्री का गर्वित शोभित मंच 
तरुणाई पर अरुणाई का लाश्य लाश्य नर्तन 
अभिलाषित चातक अभिनंदित ,रूप सुधा वरने 

सहज दर्पिता रूप गर्विता कीलय वाक विलास 
मद्द मधु ऋतु ,सौम्य संहिता ,सत्कारी शुभ  हास 
सुभ्र दन्तिका चित्र पदमिनी ,धीर धरा गंभीर 
उद्धेलित कर्षण ,आकांक्षित ,विंध्य भर धरने 

चंद्रमुखी के अधर मध्य में पल्ल्व पंकज देश 
कौतुक कटि हठ ,धनिक कम्बु घट,विन्यासित पट केश 
उन्नत हिमगिरि ,मध्य शिवा सा अद्भुत अभाकाश 
चकित काम , संधान त्याग तज , जुटा  भक्ति करने 

जगदीश महामना "गर्दू ग़ाफ़िल "

Thursday, February 11, 2016

यूं संवारों तुम स्वयं को न्यास बन जाओ

 एक नए बंध के साथ गीत पुनः प्रस्तुत कर रहा हूं


यूं संवारों तुम स्वयं को न्यास बन जाओ
ऐसे डूबो   प्रेम में  , संन्यास  बन जाओ

वेग में आवेग में ,आवेश के परिवेश में
धीर ना छूटे कभी निज देश में परदेश में
हम रिषि संतान है,  व्यवहार में दीखे
सत्य के सन्मार्ग का अभ्यास बन जाओ
ऐसे डूबो ग्यान में,कि व्यास बन जाओ

यूं संवारों तुम स्वयं को न्यास बन जाओ
ऐसे डूबो   प्रेम में  , संन्यास  बन जाओ

त्याग का उत्सर्ग का ,उत्कर्ष का उन्वान
सत्य का सहभाग का सहयोग का सन्मान
धर्म की धारा धरा पर नित प्रवाहित कर
इस जगत की मौज के मधुमास बन जाओ
ऐसे डूबो भक्ति मेें , अरदास बन जाओ

यूं संवारों तुम स्वयं को न्यास बन जाओ
ऐसे डूबो   प्रेम में  , संन्यास  बन जाओ

मन सुमन खिल जाएं पुलके पौर घर आंगन
रूप से अनुराग का अनुबंध हो जीवन
लोकपथ से राजपथ के सेतु हेतु तुम
संत्रास से अवकाश ले उल्लास बन जाओ
ऐसे डूबो नृत्य में सुखरास बन जाओ

यूं संवारों तुम स्वयं को न्यास बन जाओ
ऐसे डूबो   प्रेम में  , संन्यास  बन जाओ




मम