Sunday, January 21, 2018

मत दायित्वों से भागों अब

अपने अपने हृदय जगाओ ' शौर्य जगाओ जागो अब
समय देश का आया है ' मत दायित्वों से भागो अब

निष्ठाओं पर ग्रहण लगाने ' अनगिन राहू केतू हैं
अंधकूप वाचाल हो रहे, सबके अपने हेतु हैं
अनय कूट की मूर्च्छा हर ' अमिय बांटने निकलो अब
निर्बल दीन हीन जीवन का तिमिर छांटने निकलो अब

नीति न्याय का समय उठे तम को यह स्वीकार नहीं
लोभ निगल लेता मूल्यों को ,सत्य को अब सत्कार नहीं
कटु दुर्नीति दमन करो, संस्कृति जगाने निकलो अब
बन रामकृष्ण 'बन महावीर' देवत्व जगाने निकलो अब

धनपशुओं को नहीं सुहाते ' सेवा, नवल प्रबंधन ' हाँ
कुलटा कूटों को ही भाते ' आंधियारे गठ्वंधन हां
शुद्ध बनो, नवबुद्ध बनो ,नववोध दिलाने निकलो अब
जनमन के दारिद्रय हरण' श्री बुद्धि खिलाने निकलो अब

साहित्य हमारा साधन सारस्वतजन संसाधन

Sunday, July 5, 2015



साहित्य हमारा साधन सारस्वतजन संसाधन
निश्चित है लक्ष्य हमारा भारत को विश्व सिंहासन

पग पग पर नीर बदलता पग पग बदले भाषाएँ
एक सूत्र हम सब का योगी हों दसों दिशाये
हम प्रज्ञा के अर्चक हैं, हम नीति के निर्माता
हम ऋषि तत्व के साधक हम भारत भाग्य विधाता
संस्कृति उत्थान करेंगे जय मंगल गान करेंगे
गूंजेगा सकल जगत मेँ भारत का विधि अनुशासन

साहित्य हमारा साधन सारस्वतजन संसाधन
निश्चित है लक्ष्य हमारा भारत को विश्व सिंहासन

निज गौरव की विस्मृति से,हा! हतबल राष्ट्र हमारा
निर्बलता का कारण है ,यह जाति पंथ बंटवारा
निर्वीर्य हुए सौ  कोटि ,तज धर्माधारित जीवन
दु:खों से मुक्त न कोई , बालापन वृद्धा यौवन
अंतर की त्याग मलिनता ,बाहर करने अरिमर्दन
संकल्पित तेज जगाने ,करना है धर्म -स्थापन

साहित्य हमारा साधन सारस्वतजन संसाधन
निश्चित है लक्ष्य हमारा भारत को विश्व सिंहासन

3:52PM, 16/02/2015] jgdis Gupt:महामना


गर्दूं-गाफिल at 11:48 PM

हम निकट नहीं तो क्या

Sunday, July 5, 2015


हम निकट नहीं तो क्या
मै साथ नहीं तो क्या
मेरे हिस्से का टीका
माथे पे सजा लेना
गालों को गुलालो स े
रच लेना भिगो लेना

स्नेह वलय सारे
तुमपर ही निछावर है
स्मृतियों की गागर में
छवियों के सागर हैं
मन के दर्पण में
वह समय जगा लेना
मेरे हिस्से का टीका
माथे पे सजा लेना

त्यौहार ये रंगो का
संजीवन का अवसर
द्वार आ खड़ा है
सत शुभ कॉवर लेकर
जीवन के कटु कल्मष
होली में जला देना
मेरे हिस्से का टीका
माथे पे सजा लेना

रंग भरी भंग भरी शुभकामनाएं

जगदीश गुप्त महामना
[9:49AM, 05/03/2015] jgdis Gupt:

गर्दूं-गाफिल at 11:52 PM

भंग के उमंग के तरंग के

Sunday, July 5, 2015


भंग के उमंग के तरंग के
झांझ के सितार के मृदंग के
आ गए अबीर के गुलाल के
पल ये संगसाथ के धमाल के

अंग अंग फूलती कुंअर कली
मंद मंद मेदनी पवन चली
मन मलय तन प्रलय अनंग के
पल कमल किलोल के कलाल के
आ गए अबीर के गुलाल के
पल ये संगसाथ के धमाल के

देह नेहपान को तृषित द्रवित
लौ जगी धूम्र छंट गए दमित
डाल डाल डोलते विहंग के निहंग के
फुर्र हुए छण सभी कसाल के
आ गए अबीर के गुलाल के
पल ये संगसाथ के धमाल के
[2:17AM, 01/04/2015] jgdis Gupt:

गर्दूं-गाफिल at 11:53 PM

छोटी छोटी खुशियों से ही बड़े बड़े गम गलते हैं

Sunday, July 5, 2015


अतीत के झरोखे से

13/10/1996 के राजनांदगांव के सबेरा संकेत में प्रकाशित रचना का आस्वादन कीजिए

छोटी छोटी खुशियों से ही बड़े बड़े गम गलते हैं
एक चिराग महकता है तो बड़े अंधेरे ढलते हैं

पलकों पर बिखरे हैं सपने खो न देना राहों में
कदम दर कदम चलने से मंजिल के दर मिलते हैं

मामूली तकरारों से ही रोज बिखरते हैं रिश्ते
ज़र्रा ज़र्रा कतरों से ही बड़े हिमालय मिलते हैं

उकसावों में उगल न देना अंगारों की ओर हवा
हल्की सी इक चिंगारी से बड़े बड़े घर जलते हैं

रोज रोज की मुस्कानों ने रिश्ते कई सहेजे हैं
बूंद बूंद बारिश से 'ग़रदूं' दरिया कई निकलते हैं

हम सब हैं लाचार सुनो ऐ ज़ुल्म सितम ढाने वालो
मजलूमों के वोट मगर सरकारें कई बदलते हैं

मीठी नज़रों की खुश्बू से खुश होता मन का मधुवन
मीठी प्यारी बोली से ही मौसम कई बदलते हैं
[1:38AM, 04/04/2015] jgdis Gupt:

नीयत और नियति

 लगभग २० साल पहले एक चिंता कविता होकर उतरी थी
आज माननीय मोदी जी के बैंगलोर में भाषण का आरंभ के मनोभाव सुन कर मन किया इसे आप से साझा करने का

नीयत और नियति

नीयत ना बदलेंगे तो फिर
नियति भला कैसे बदले
नियति वही रहना है तो
सरकार बदल कर क्या हासिल ?

कुछ लोग बदल जायेंगे बस
कुछ समीकरण हों परिवर्तित
नहीं बदलना है गर दिल
चेहरों को बदल कर क्या हासिल?

हवन यदि फिर भी पठ्ठों के हाथ रहा
और राज दंड भी उद्दंदों के साथ रहा
गीले कंडों की समिधा धुआं करेगी ही..
पंडे और पंडाल बदल कर क्या हासिल?

वंचित को शक्ति ना मिल पाए
मूक ना अभिव्यक्ति पाए
यदि लूट बरामद हो ना सके
धावों दावों से क्या हासिल?

मन आवर्धन बिना नहीं संभव परिवर्धन
सहकार करो,आराध्य बनाओ गोबर्धन
यदि पीर न जाए पांवों की
 तो पीर पूज कर क्या हासिल

पापी मन ले सुरसरि कैसे होगी साफ
अपनों  में ही अटके हैं ,करिएगा माफ
 यदि मन  की पावनता लक्छय नहीं
निर्मल गंगा से क्या हासिल
[12:37AM, 04/04/2015] jgdis Gupt:

हो गया छवि देखकर मैं मुग्ध जिसकी

Sunday, July 5, 2015


एक वर्षों पुराने खुदरा कागज से सहेज ली आज एक अनगढ़ रचना

हो गया छवि देखकर मैं मुग्ध जिसकी
आ रहा आभार है उस मूर्तिका पर
मन मालिनी मकरंद रज की भूमिका में
छा गई है मन भुवन की बुर्जिका पर

ग्यात से अग्यात के पथ पांव अनुचर
धूप से सुख छांव तक के नित्य सहचर
अभिमाननी आंख में उतरा प्रणयपल
माधुर्य आया तब भंवरती गीतिका पर

आह्लाद के आभार में श्रृगांर कर आई
मधुरिमा प्रतिदान का संकेत कर आई
प्रतिदृष्टि में कौंधी धजा विद्युल्लता सी
लावण्य भर आया सहमती रीतिका पर

[12:25AM, 05/04/2015] jgdis Gupt: