Thursday, August 9, 2018

प्रीत तुम्हारी गाते गाते

प्रीत तुम्हारी गाते गाते
गीतो का आगार हुआ
गाते गाते रूप तुम्हारा
मैं स्वतः श्रृंगार हुआ

कज्जल अपने उर लेते हैं
गहरे सरोवरो के तल
पिपासुओं के निमित्त प्रियवर
सतह सहेजें जल निर्मल
जीवन के दुर्गम पथ थे
सुविधा के जर्जर रथ थे
चंदन मन का संबल पाकर
मार्ग सहज निर्भार हुआ

कामनाओं के ववंडरों में
आंखों चुभते खंड सपन
राग मोह के लोभ दहकते
अभिमानों के ईर्ष्या वन
किंतु सौम्य शीतलता देती
सलिलातट सी सुवस पवन
संस्पर्शों का अमृत पाकर
मृदा रसज अवतार हुआ

अभिलाषा के ऊंचे अंबर
चातक मन की मौन घुटन
अभिव्यक्ति के सीमित अवसर
कीलित कलुषित वातायन
किंतु घटा में चन्द्रप्रभा सी
विखराती मृदुहास कुसुम
कोमलता का संबल पाकर
निर्जन अजर विहार हुआ

महामना

Saturday, August 4, 2018

देखता है समय सच को

देखता है समय सच को अचकचाकर
हंस रहे हैं झूठ सारे खिलखिलाकर

रातभर तरसे थे हम जिस अरूणिमा को
अरूण भी न ला सका उस लालिमा को
सिंहासनों पर आ विराजीं बदलियां
जयघोष कर गरजीं गिरीं फिर बिजलियां
डर गई सारी छतें , आवाज मिमियायी
हर स्वाभिमानी किरण लौटी तिलमिलाकर

भेड़िए निकले जिन्हें समझा गऊ था
चाटते थे वे जिसे ' अपना लहू था
आश्चर्य !( आह रे ) कैसे निरापद रह सके हम
पौ फटे आंखें फटीं थे गिद्ध हमदम
धिक इन्हें पोसा समझ कर  सर्वहारा
देखता ही रह गया मन डवडबाकर

इस दौड़ में रुकना औ मरना है बराबर
दिख रहा सच ' झूठ है लेकिन सरासर
छद्म युग है धर्म संस्थापन जटिल है
युक्ति का आश्रय करें शत्रु कुटिल है
सन्निकट सत्क्रांति  है धीरज न खोना
कल रोएगें ये ऊंट सारे बिलबिलाकर

जिन तेवरों से बात करनी थी उन्हें
वे अभी गिरवीं हैं सत्ता के चरण में
फस गए हैं पंरव गुड़ की ढेलियों में
३सलिए है दोगलापन आचरण में
वाह गजब के तीर हैं तरकश में उनके
छिन गई सत्ता तो लाएं हैं सजाकर