करुणामय ही पीड़ाओं का हल होता है
उससे क्या आशा जो केवल विष बोता है
प्रश्न बहुत है पास तुम्हारे उत्तर का क्या
नींद बहुत है शूल भरे इस बिस्तर का क्या
हिंसक जलचर बहुत नदी में गहराई भी
छुए बिना जल प्यास बुझेगी नहीं कभी भी
मिल जाएंगे समाधान अभ्यासों में बल होता है
अतिसूक्ष्म ... विषकण, जीवन पर भारी है
ठहर गई गति अब विकास पर भय तारी है
हंसने लगे फूल निरापद चिड़िया गाती
कालचक्र की इस गति पर सहसा मुस्काती
जिनका नहीं आज उनका भी क्या कल होता है
ऊब चले हैं लोग बहुत अवकाश हुआ अब
ठहरा है जल काई का आवास हुआ अब
दुखने लगे पांव सर आंखे बैठे बैठे
पत्थर भी थक गया बहुत दिन ऐंठ ऐठें
तिनकों का ही ऐसे में संम्बल होता है
महामना" जगदीश गुप्त