Thursday, April 2, 2020

करुणामय ही पीड़ाओं का हल होता है

करुणामय ही पीड़ाओं का हल होता है 
उससे क्या आशा जो केवल विष बोता है

प्रश्न बहुत है पास तुम्हारे उत्तर का क्या
नींद बहुत है शूल भरे इस बिस्तर का क्या
हिंसक जलचर बहुत नदी में गहराई भी
छुए बिना जल प्यास बुझेगी नहीं कभी भी
मिल जाएंगे समाधान अभ्यासों में बल होता है

अतिसूक्ष्म ... विषकण, जीवन पर भारी है
ठहर गई गति अब विकास पर भय तारी है
हंसने लगे फूल निरापद चिड़िया गाती
कालचक्र की इस गति पर सहसा मुस्काती
जिनका नहीं आज उनका भी क्या कल होता है

ऊब चले हैं लोग बहुत अवकाश हुआ अब
ठहरा है जल काई का  आवास हुआ अब
दुखने लगे पांव सर आंखे  बैठे बैठे 
पत्थर भी थक गया बहुत दिन ऐंठ ऐठें
तिनकों का ही ऐसे में संम्बल होता है

महामना" जगदीश गुप्त