Saturday, October 27, 2018

अनमना है गगन और धरा मौन रै

अनमना है गगन और धरा मौन है
किंचित है विचलित मन समीर का
तमतमा गया मुख सूर्य का
खुल गया है कोई स्कंध पीर का

कर २ही है निर्जला राहीओं की देह
धूम्रध्वज लिए आवेग में पवन
धूलधूसरित आकाश हो गया
हुलस मलिन  है धूप में सुमन
भोर से प्रखर हो ग्ए दिनकर
याचित हुए , गुहा और विवर
ववंडरों के डर सहमीं गुमटियां
तरस रहे हैं बादलों को मन
सुलग उठे हैं विटपों के तन
खौल गया है धीर नीर का

लय ताल छोड़कर न्यायी दिगभ्रमित
पीट रहे हैं ढोल और मृदंग
गणमान्य और प्रवर अधिमान्य विप्रवर
नाच रहे हैं उन्मत्त हो अनंग /चढ़ा भंग
क्रंद मंद हो सिसकिया हुआ
अबोध बन रहे संस्थान और स्तंभ
रूठने लगा स्वभाव मौज का
छूटने लगा साहस समाज का
टूटने लगा पिचकारियों का दम
उड़ गया है रंग मुख से अबीर का